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गुरुवार, 16 अगस्त 2012

















मैं भीनी रात सी इस आसमान में छ रही हूँ
कुहुक मल्हार सा उर में गगन के गा रही हूँ .

सच

कौन कहता है सच सुना उसने ?
कौन बोला है सच ज़माने से ?
एक चुप्पी है राज़ रहती है
बात बन जाती है ज़माने में .


२५-२-०९

 







 


रोशनी का कतरा हूँ, बाँधोगे कैसे मिटटी में ?२८-३-08







 







 


 

 









ज़मीन पर न सही
आसमान में कहीं
होगा कोई
सुने जो दिल की कही


२५-२-०९


बोध

ज्यूँ कीचड में ही पावन
पंकज है खिलता
बीज बोध का दुःख में,
सुख में केवल पलता .



२५-२-०९

 

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