फ़ॉलोअर
मंगलवार, 20 नवंबर 2018
शनिवार, 20 अक्टूबर 2018
शरद पूनम सुहानी
शरद का सुंदर नीलाकाश, निशा निखरी, था निर्मल हास'
बह रही छाया पथ में स्वच्छ, सुधा सरिता लेती उच्छ्वास,
पुलक कर लगी देखने धरा, प्रकृति भी सकी न आँखें मूंद;
सु शीतलकारी शशि आया'! सुधा की मनो बड़ी सी बूँद..❤🕉❤
सुधा की बूंद ने सुध बुध भुला दी...मधुर महारास की स्मृति जगा दी..हृदय मे राग उमडे अनसुने से.. थिरकते रोम पुलकित ..तुहिन कण से..
बह रही छाया पथ में स्वच्छ, सुधा सरिता लेती उच्छ्वास,
पुलक कर लगी देखने धरा, प्रकृति भी सकी न आँखें मूंद;
सु शीतलकारी शशि आया'! सुधा की मनो बड़ी सी बूँद..❤🕉❤
सुधा की बूंद ने सुध बुध भुला दी...मधुर महारास की स्मृति जगा दी..हृदय मे राग उमडे अनसुने से.. थिरकते रोम पुलकित ..तुहिन कण से..
सोमवार, 17 सितंबर 2018
गुरुवार, 14 सितंबर 2017
रात रागिनी
बादलों ने रात संग इक तान छेड़ी
फूल महके पत्तियां भी गुन गुना दीं
रजनीगंधा मस्त थिरकी , बावली कोयल
कहीं से कुहू कुहाई ..
सरसराती पवन गूँजी ..
मोगरे की धवल चितवन ,
साँस में उग आया मधुबन ..
कुमुदिनी मुग्धा निहारे चाँद प्रियतम
चांदनी ज्यूँ बांटती फिरती निमंत्रण
अणु-परमाणु रचाते रास क्षण क्षण
कौन है जो अनोखे भाव भर कर
पल - पल करवा रहा प्रकृति का नर्तन ?
कौन वीणा सी बजा झंकारता स्वर ?
रूप अगणित, भाव अगणित,
वर्ण अगणित, राग अगणित
धिनक धिनक दिन
तिनक तिनक तिन,
ध कि न कि नाका धिन,
त तिन तिन धिन
सरर सरर सर
मर्मर मर्मर
गुन गुन गुन गुन
रुनझुन रुनझुन
स्वर का संगम ताल झमाझम
मद्दम मद्दम मंथर मंथर
अद्भुत नर्तन ,गायन वादन
पल पल क्षण क्षण
मधुर अलापन ..
13-14 sept 17
फूल महके पत्तियां भी गुन गुना दीं
रजनीगंधा मस्त थिरकी , बावली कोयल
कहीं से कुहू कुहाई ..
सरसराती पवन गूँजी ..
मोगरे की धवल चितवन ,
साँस में उग आया मधुबन ..
कुमुदिनी मुग्धा निहारे चाँद प्रियतम
चांदनी ज्यूँ बांटती फिरती निमंत्रण
अणु-परमाणु रचाते रास क्षण क्षण
कौन है जो अनोखे भाव भर कर
पल - पल करवा रहा प्रकृति का नर्तन ?
कौन वीणा सी बजा झंकारता स्वर ?
रूप अगणित, भाव अगणित,
वर्ण अगणित, राग अगणित
धिनक धिनक दिन
तिनक तिनक तिन,
ध कि न कि नाका धिन,
त तिन तिन धिन
सरर सरर सर
मर्मर मर्मर
गुन गुन गुन गुन
रुनझुन रुनझुन
स्वर का संगम ताल झमाझम
मद्दम मद्दम मंथर मंथर
अद्भुत नर्तन ,गायन वादन
पल पल क्षण क्षण
मधुर अलापन ..
13-14 sept 17
बुधवार, 29 मार्च 2017
केवल कृष्ण
जिसके मात्र स्मरण से ही हर संताप बिसर जाता है
वह तो केवल एक कृष्ण हैं !
जिसकी स्वप्न झलक पाते ही
हर आकर्षण बिखर जाता है
जो सबके दुःख का साथी है
सबका पालक, जनक, संहर्ता
वह तो केवल एक कृष्ण हैं !
साक्षी सबके पाप पुण्य का,
न्यायमूर्ति सृष्टि का भरता,
वह अवतार प्रेम का मधु का,
अनघ, शोक मोह का हरता
वह तो केवल एक कृष्ण हैं !
वह तो केवल एक कृष्ण हैं !
जिसकी स्वप्न झलक पाते ही
हर आकर्षण बिखर जाता है
जो सबके दुःख का साथी है
सबका पालक, जनक, संहर्ता
वह तो केवल एक कृष्ण हैं !
साक्षी सबके पाप पुण्य का,
न्यायमूर्ति सृष्टि का भरता,
वह अवतार प्रेम का मधु का,
अनघ, शोक मोह का हरता
वह तो केवल एक कृष्ण हैं !
मैं सगर्भा
मैं सगर्भा, सार्गर्भा , ब्रह्म का विस्तार,
जीव की हूँ वासना तो विज्ञ का संसार ।
शक्ति का अवतार हूँ अस्तित्व का आधार
धारिणी समभाव की कर्षण करूँ अहंकार
कामिनी हूँ 'काम' की हूँ जन्मति भी राम
पुण्य रूपा पापिनी हूँ पुरुष का आयाम,
अग्नि-सी हूँ दाहका पर देती हूँ विश्राम
शव बना सकती हूँ 'शिव',माधुर्यमय घनश्याम
रचनाकाल : 25 फ़रवरी 2009
जीव की हूँ वासना तो विज्ञ का संसार ।
शक्ति का अवतार हूँ अस्तित्व का आधार
धारिणी समभाव की कर्षण करूँ अहंकार
कामिनी हूँ 'काम' की हूँ जन्मति भी राम
पुण्य रूपा पापिनी हूँ पुरुष का आयाम,
अग्नि-सी हूँ दाहका पर देती हूँ विश्राम
शव बना सकती हूँ 'शिव',माधुर्यमय घनश्याम
रचनाकाल : 25 फ़रवरी 2009
adha akash hamara


गुरुवार, 2 मार्च 2017
रविवार, 25 जनवरी 2015
मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014
गुरुवार, 23 जनवरी 2014
जननियाँ

वह तपस्वी थे अवतारी जगदगुर भटके थे वर्षों
हिमालय की चोटि से सागर तट तक ,कहलाये आर्ष पुरुष
उनका सन्देश -तुम शरीर नहीं आत्मा हो
जियो पर समझो- तुम परे हो देह से ,भय नहीं, प्रेम करो .
सुनकर ये सन्देश बन गए लाखों पुरुष उनके शिष्य .
मैं हंसी और मेरी हंसी रुकी ही नहीं .
काश ये गुरु और उनके अनुयायी सोचते और पूछते
आर्ष सत्य जीवन का अपनी जननी से तो क्यों भटकते
उम्र भर अहंकार के जंगलों में ?
क्यों की माँ बता देती यह सत्य चंद लम्हों में .
स्त्री है जो जीती है आजीवन शरीर से पृथक हो कर .
जब वर्जना परिजनों की, समाज की, रौंदती है उसका मन
पोषती है केवल उसका तन .
सौंप दी जाती पति को, तिरोहित उस आँगन से जहां उगी थी.
रखती है हर कदम सोच सम्हल कर पति के घर मैं .
घिरी कंटीली नज़रों से.जबकि आत्मा भटकती है उसकी
तितली सी, फूलों पर, जहां पाया था स्नेह निश्छल कुछ आँखों में .
यंत्रवत वह देखती है अपना चीरहरण पति के घर में .
पति व ससुराल के सम्बन्धियों के अहंकार से जन्मे कितने ही
नृशंस पशु करते हैं आक्रमण उस पर- तानों के, व्यंग्बाणों के
षड्यंत्रों के .पर वह भयभीत न हो कर सहती है सबकुछ
क्योंकि सम्हालनी है उसे इज्ज़त अपने वंश की .
केवल सौम्य मुस्कान उसकी कर देती है निरस्त
नृशंस पशुओं को .

अष्टांग योग का शिखर है समाधि
अर्थात शरीर से विलग आत्मा की स्वतन्त्र उड़ान
परमात्मा में,शून्य में .
वह जीती है ताउम्र समाधी में
पति से नुचता,रुन्दता अपना शरीर देखती है
निर्विकार क्योंकि उसका तन है पति की धरोहर
और संतान की ज़रुरत .
वह पोसती है अपना तन ताकि बच्चे पलते रहें
हंसते रहें,चहकते रहें .
वह जलती है उम्रभर दीपशिखा सी.ताकि महके- खिले- दमके
जीवन की बगिया घर आँगन में.
वह जलाती है ज्योति से ज्योति जीवन की, जब
कहती है बेटी से- तेरा घर यहाँ नहीं
शादी के बाद बसेगा
तेरा तन धरोहर है पति की ,संतान की भले ही तेरी आत्मा भटके कहीं भी
तू देना उसे शान्ति मंदिर की मूर्ति में, धर्मग्रंथों में, कविता में, लोकगीतों में .
तू करना सेवा निस्वार्थ रिश्तो की, पति की, बच्चों की, फिर उनके बच्चों की .

मंदिर और आश्रम के परिसर में दीपक जलाते गुरु और उनके शिष्य
जलाते हैं दिए सोने,पीतल या मिटटी के और हो जाते हैं पूज्य
जबकि जीवन भर युगों से जलती स्त्रियाँ ,तपती जननियाँ
जो जलाती रहती हैं चुपचाप ज्योति जीवन की, हर घर आँगन में
फिर भी रह जाती हैं अपूज्य, अपमानित ,तिरस्कृत, पुरुष के अहम् से .
तेरा तन धरोहर है पति की ,संतान की भले ही तेरी आत्मा भटके कहीं भी
तू देना उसे शान्ति मंदिर की मूर्ति में, धर्मग्रंथों में, कविता में, लोकगीतों में .
तू करना सेवा निस्वार्थ रिश्तो की, पति की, बच्चों की, फिर उनके बच्चों की .

मंदिर और आश्रम के परिसर में दीपक जलाते गुरु और उनके शिष्य
जलाते हैं दिए सोने,पीतल या मिटटी के और हो जाते हैं पूज्य
जबकि जीवन भर युगों से जलती स्त्रियाँ ,तपती जननियाँ
जो जलाती रहती हैं चुपचाप ज्योति जीवन की, हर घर आँगन में
फिर भी रह जाती हैं अपूज्य, अपमानित ,तिरस्कृत, पुरुष के अहम् से .
गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013
सदस्यता लें
संदेश (Atom)












