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गुरुवार, 13 जून 2013

श्री राधे 
 मूक हूँ अभिभूत हूँ !
युग युगांतर की तृषा से,त्राण पा अवधूत हूँ !
कृष्ण ने चाहा  उसे -
जिसने मितायी उस को दी! कृष्ण ने त्यागा उसे -
जिसने विदाई उसको दी !
कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति-
 
जिसे राधा कहो !
कृष्ण की उन्मादिनी भक्ति-
 
जिसे राधा कहो !
कृष्ण,कर्षण कर सकी -
रमणीजिसे राधा कहो !
उस रमणी की चरण रज हूँ !
धूल हूँ !
मूक हूँ ,अभिभूत हूँ !
युग युगांतर की तृषा से त्राण पा अवधूत हूँ !
श्री दिनकर जोशीजी ने राधा -कृष्ण के दिव्य प्रेम मय सम्बन्ध पर एक पुस्तक लिखी है _"श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते उसे पढ़ने के बाद जो अनुभूति हुई,उसी की अभिव्यक्ति है यह रचना .
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कृष्ण 



जिसके मात्र स्मरण से ही हर संताप बिसर जाता है वह तो केवल एक कृष्ण हैं !
जिसकी स्वप्न झलक पाते ही हर आकर्षण बिखर जाता है जो सबके दुःख का साथी है सबका पालकजनकसंहर्ता वह तो केवल एक कृष्ण हैं .
साक्षी सबके पाप पुण्य का ,न्यायमूर्ति सृष्टि का भरता ,वह अवतार प्रेम का मधु का ,अनघ,शोक मोह का हरता वह तो केवल एक कृष्ण हैं

5-4-09







 
 


 
शोक निवारक योग

योगेश्वर ने है दिया शोक निवारक योग ,
सृष्टि के है मूल में आधेयआधार .
प्रकृति के पीछे पुरुष,पुरुष -प्रकृति आधार ,
फल आधारित पुष्प पर,पल्लव पुष्प आधार .
पल्लव आश्रित शाख परतना शाख आधार,
मूल आधार स्कंध की बीज वृक्ष आधार .
बीज आधारित भूमि पर,भूमि परिक्रमा बाध्य ,
करती पथ पर ही गमन ,सूर्य देव आराध्य .
ढूध-धवलता  पृथक अग्नि से ताप ,
जल -रस,प्रकृति -गंधमयवायु सहित है भाप,
राधा -माधव एक हैं एक तत्व दो नाम ,
 शासक  शासिताप्रेम बहे निष्काम .
आत्मा शाश्वत तत्व है ,रूप व्यक्त आधार
 नारी - नर दो बिम्ब हैं दोनों सृजन आधार .

२०.०६.२०१०


 
जननियाँ

वह तपस्वी थे अवतारी जगदगुर भटके थे वर्षों
हिमालय की चोटि से सागर तट तक ,कहलाये आर्ष पुरुष
उनका सन्देश -तुम शरीर नहीं आत्मा हो
जियो पर समझो तुम परे हो देह से ,भय नहीं प्रेम करो .
सुनकर ये सन्देश बन गए लाखों पुरुष उनके शिष्य .




मैं हंसी और मेरी हंसी रुकी ही नहीं .
काश ये गुरु और उनके अनुयायी सोचते और पूछते
आर्ष सत्य जीवन का अपनी जननी से तो क्यों भटकते
उम्र भर अहंकार के जंगलों में ?क्यों की माँ बतादेती यह सत्य चंद लम्हों में .
स्त्री है जो जीती है आजीवन शारीर से पृथक हो कर .
जब वर्जना परिजनों कीसमाज की रौंदती है उसका मन
पोषती है केवल उसका तन .
सौंप दी जाती पति कोतिरोहित उस आँगन से जहां उगी थी.
रखती है हर कदम सोच सम्हल कर पति के घर मैं .
घिरी कंटीली नज़रों से.जबकि आत्मा भटकती है उसकी





तितली सी फूलों पर जहां पाया था स्नेह निश्छल कुछ आँखों में .
यंत्रवत वह देखती है अपना चीरहरण पति के घर में .
पति  ससुराल के सम्बन्धियों के अहंकार से जन्मे कितने ही
नृशंस पशु करते हैं आक्रमण उस परतानों के, व्यंग्बानों के
षड्यंत्रों के .पर वह भयभीत  हो कर सहती है सबकुछ
क्योंकि सम्हालनी है उसे इज्ज़त अपने वंश की .
केवल सौम्य मुस्कान उसकी कर देती है निरस्त
नृशंस पशुओं को .अष्टांग योग का शिखर है समाधि
अर्थात शरीर से विलग आत्मा की स्वतन्त्र उड़ान
परमात्मा में,शून्य में .
वह जीती है ताउम्र समाधी में
पति से नुचता,रुन्दता अपना शरीर देखती है
निर्विकार क्योंकि उसका तन है पति की धरोहर
और संतान की ज़रुरत .
वह पोसती है अपना तन ताकि बच्चे पलते रहें
हंसते रह्ने,चहकते रहें .
वह जलती है उम्रभर दीपशिखा सी.ताकि महकेखिलेदमके
जीवन की बगिया घर आँगन में
 
वह जलाती है ज्योति से ज्योति जीवन  की जब
कहती है बेटी सेतेरा घर यहाँ नहीं शादी के बाद बसेगा
तेरा तन धरोहर है पति की ,संतान की भले ही तेरी आत्मा भटके कहीं भी
तू देना उसे शान्ति मंदिर की मूर्ति में, धर्मग्रंथों मेंकविता में, लोकगीतों में .
तू करना सेवा निस्वार्थ रिश्तो कीपति कीबच्चों कीफिर उनके बच्चों की .
मंदिर और आश्रम के परिसर में दीपक जलाते गुरु और उनके शिष्य
जलाते हैं दिए सोने,पीतल या मिटटी के और हो जाते हैं पूज्य
जबकि जीवन भर युगों से जलती स्त्रियाँ ,तपती जननियाँ
जो जलाती रहती हैं चुपचाप ज्योति जीवन की हर घर आँगन में
फिर भी रह जाती हैं अपूज्य अपमानित तिरस्कृत पुरुष के अहम् से .
5-4-09

ह्रदय की घाटी 




छू  पायेंगे ह्रदय की घाटियों को ग्रीष्म के उजाले फुएं से मेह.
 हवाओं इन फुओं को ले उडाओ झलकने दो शांत नभ का नेह .
बादलों का प्रेम निष्ठुर बींध देता देह कभी रिमझिमकभी गर्जन-क्रूर भर हुंकार आँधियों सा उमड़ता तो कभी चक्रावात ,कभी ओलों सा बरसकर बन गया एक भार .
घाटियों की भूमि नाम है मत करो अघात गुनगुनाती धूप से दो भूमि को श्रृंगार ,उलसने दो बीज फूलों के बनो वातास ,प्रेम में स्पर्श दैहिक खोजो  साभार ,






मुक्त फूलों की महक है मुक्त रश्मि-विलास मुक्त है उर मुक्त है स्वर मुक्त मधुकण हास मुक्ति सबकी कामना है मुक्ति में हैं राम
२७--09