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गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

साँचे मीत

साँचे मीत

23 October 2013 at 13:24

जो सुनते बिन वाणी,
                  साँचे मीत वही..
                       झूठी प्रीत ही मानें सच,
                                       सुनी-कही

यात्रा

यात्रा

9 October 2013 at 11:37

यात्रा गंतव्य है और यात्रा ही भावना ..
         यात्री ऐसे बनो मिट जाए सारी कामना ...
              क्यूँ भला हो फिर प्रतीक्षा आएगा मिलने कोई ?
                       जब मिला वह इस तरह मिल कर जुदा होता नहीं ..


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खेल

4 October 2013 at 14:22

दिल में ईश्वर सबके
ईश्वर में दिल किसी किसी का
जब दोनों मिल जाएँ
ख़त्म हो जाता खेल सभी का
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निश्चल प्रेम

5 September 2013 at 15:01

जो चाहे मर्त्य वस्तु को
                      उसका प्रेम छल भर है
जो न मांगे कभी कुछ भी
उसी का प्रेम निश्चल है .Image may contain: one or more people and text

सच

23 September 2013 at 16:56

सच अक्सर कड़ुवा होता है
                       दुनिया गोरख धंधा है
जिसे खोज हो सच की
                         वह केवल एकाकी बंदा है
जो चाहे जग से कुछ भी,
                       है हर दम दयनीय सदा ..
अपने अंतर्जग से सुरभित
                         आत्म रमण चयनीय सदा ..

गुरुगीत

5 September 2013 at 14:35
अन्धकार को दें मिटा,
 दें प्रकाश मय ज्ञान, 
 गुण रूप से परे, 
सिखलाएँ आत्मा का ध्यान 
 गुरु अगणित हरेक के,
बने शिष्य जो कोई माँ,
 प्रकृति, बंधू, पिता, सखा स्नेहि हो कोई
 गुरु बिन जीवन जड़ सदा, 
चेतन ज्ञानी होए 
 आत्मध्यान में रत रहे
 आत्मामय गुरु होए
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परम सुख

4 September 2013 at 11:20

प्रहार जब जब मिलें
तिलमिलाता है अहम्
अहम् हम को नचाता,
चोट खाता है अहम्
अहम् से मुक्त हों,
तत्क्षण परम सुख प्रकट
आत्म सुख अभ्यास से,
टूटती माया विकट
जय श्री राधे!

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कृपा है

4 September 2013 at 13:17

कृपा है बनवारी की
                      कविता उनका खेल
                                           रचते हैं ब्रहमांड अनंत
                                                                  अपना उनसे मेल



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शिष्टाचार ..

27 August 2013 at 17:32
कौन चाहता है मिटे
जग से भ्रष्टाचार
दुःख मिले तब ही कहें
क्यों है भ्रष्टाचार
.सुख मिले तो कहें
यह है शिष्टाचार ..

विवशता

12 August 2013 at 14:40
विवश हर कोई है
जग में No automatic alt text available.अनेको
बन्धनों के हेतु
तरसता हर ह्रदय
हो प्यार, मिले
कोई मधुर सेतु ..........Image may contain: 5 people

विद्रोह

12 August 2013 at 14:05

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आत्मा विद्रोह जब
                               करती कभी
                                           देह लगती धूल
                                                                 दुनिया शव मयि


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नशा है ..

23 May 2013 at 11:59

दिशा है न दशा है ..
                   प्रेम है यह पूर्ण ..
                                    जीने का नशा है ..
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अश्रु अपना प्यार ..

8 November 2012 at 08:55
न अछूता तार हैं तू ...न ही अश्रुधार ..
                   तार मेरा,स्वर तू मेरा अश्रु अपना प्यार ..
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सोमवार, 12 अगस्त 2013

मुक्तिगीत 
मन 








दूर कहीं  मेरे इस घर से ,एक क्षितिज है ,वहीं कहीं इस वसुधा पर झुकता अम्बर है . हटा अँधेरा पुर्व रात्री का चंचल किरणें आयीं हैं ,नभ धरती के मिलन वक्र पर रक्तिम आभा छाई है .
किरणे बुनती मेरे द्वारे ताने -बाने ,मन मेरा अब तक सोया है चादर ताने .
जैसे कितने मीलों तक चल कर आया हो
 
कितनी बाधाओं से लड़कर फिर आया हो .
पिछली रातें,उन रातों की कितनी बातें ,कितनी बातों के कितने उलझे  से तांते.
जहाँ कहीं बस कर्कश गर्जन काले टकराते मेघों का ,जहाँ सुना था मात्र एक स्वर उसने पागल आवेगों का .
वह अब भी गुमसुम ही रहता,जब तब बिलखा करता है.
रुक जाता है चलते चलते और पीछे देखा करता है -
जाने कितने ही युग बीते ,वह एक अकिंचन राही था जीता था अनजाने पन में खुद ही से रूठा फिरता था .
कितनी रातें वह जागा थाबस तारे गिनता रहता था .
फिर खुद ही ताने -बानों सेअपनी एक उलझन बुनता था उलझन को फिर चुन लेता था अनदेखेपन से जीता था .
अपनी एक प्यास बुझाने को वह विष प्याले भी पीता था .
जब भी पीछे मुड़ जाता था,वह पागल सा हो जाता था .
वह कर्कश काला भूत उसे कितने ही दंश चुभाता था .
क्या हुआ उसे ?क्यों इतना बहका करता है ?
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जब दुनिया कलियाँ चुनती है ,वह कांटे चुनता रहता है .
इतन क्यों तदपा करता है ?क्यों इतना तरसा करता है ?सूने एकांकीपन में ,कुछ सपने बुनता रहता है .
खुद को ही यह बहलाता है ,खुद ही से बातें करता है .
छिप छिप कर के मुस्काता है ,अपने पर हँसने लगता है .
पर फिर ही गम हो जाता है भीगी पलकों को मलता है .
कितना भोलापन है इसका,कितना निश्छल सा लगता है .
यह जीवन है या क्रंदन है या कोई अधूरी अभिलाषा ?बादल सा उमड़ा रोष है यह ,या मौसम गाढे  कोहरे सा ?क्यों फूलों की तरुणाई का,सन्देश भी इसे  भाता ?क्यों कलियों की अंगढ़ाई का मद इसको छू भी  पाता?यह खोजी है ,यह पागल है ,कुछ पा गलने को आतुर है .

यह छोड़ धरा के आकर्षण ,है खोज रहा आनंद सघन .
तप,त्याग ,विराग ,क्षुधा इसकी ,बस ज्ञान पिपासा सुधा इसकी .
जब बोध उसे यह होने लगा ,ताज कार्य कलाप वह  रोने लगा . जग के आकर्षण सब बंधन ,करते केवल तन -मन शोषण .
मैं खोज रहा मुक्ति का पथ ,बन हंस करूं कैसे विचरण ?उसने विश्लेषण किया सघन ,कितने उसने  जीते थे रण.
कितनों से कैसे सुख भोगे ?कितनों ने कितने कष्ट दिए ?सब खेल धूप -छाओं सा था, सुख सच था  दुःख सच था .
तो फिर सच क्या है आखिर जग में हूँ कौन भला  मैं ?क्या है सच्चा  मेरा  उदगम  ?जाना है मुझको और कहाँ ?प्रश्नों के शर  से क्षत -विक्षत ,वह सिमट गया अपने भीतर ,हर ओर निराशा अंधियारा ,शोषण का भयजैसे कोहरा -
ठिठुराए निर्धन भिक्षुक को,सिमटाये  भय से कछए को .
यूं कटा समयअस्तित्वहीन सा हो ,वह बस करता क्रंदन .
विश्लेषण -मंथन रत सब कर्म ,भाव ,विचारों का जैसे डूबे-उतरे कोई खारे भरमाते सागर में .
 दिखे कूल , मिले नाव, आता हो जिसको की तरण.
संघर्ष और लाचारी बस,छटपटा रहा जैसे कोई  -पाने को सांस ,जीवन -संबल .विषधर लिपटे हों अंगों से ,दें दंश ,कभी नोचें शरीर ,फुफकारें भर मुस्कान विषम .
फैला कर फन हो झूम रहेदिखला कर के कोटि विषदंत .
रिसतें हो घाव ,दर्द भरे ,पी रक्त भरें हुंकार सर्प .
यूँ छोड़ आस जग से तब मन उद्दयत था तजने को जीवन .
तब प्रकट हुयी ज्वाला अन्दर करने को उसका ऊर्ध्व गमन .





एक तेज पुंज देखा नभ में,अंधियारे के श्यामल वन में .
यह तो प्रकाश का तेज पुंज ! 
No automatic alt text available.आया कैसे मेरे सम्मुख ?मन  चकित हुआ ,फिर भरमायायह है आखिर कैसी माया जितना सोचा उतना ही भ्रम !यह खेल नया था नया प्रक्रम,कुछ दृश्य दिखे आलोक भरे ,यह कौन लोकयह कौन विधा ?क्यूँ अकस्मात मिट गयी क्षुधा ?बन गया गरलकैसे की सुधा ?वह वशी भूत सा उडाता गया ,नव जीवन का था लोक विलग .
पीछे क्या था  याद रहा ,छुटा क्या था  याद रहा .
बस था आनंद प्रकाश प्रखर , शत्रु , भय , शोषण .
मैं कौन ?कौन यह तेज प्रखर ?जो मुझे दे गया नव जीवन !
मन आनंदित,भरमाया सा ,क्यूँ कोई मुझे दुलार रहा ?स्पर्श नहीं ,.. ही दर्शन ..,बस एक लहर  आनंदमयी ...
'
आगे खोजो 'गूंजा एक स्वर ,मन भर श्रद्धा -विशवास नया.., ..आनंदमग्न सा उड़ता चला ..स्फूर्ति नयी उल्लास नया ...
एक दिव्य लोक था  दिव्य..जगत..केवल प्रकाशआनंद सघन .
ज्यूँ खोज हुयी मन की पूरी यात्रा की अवधि हुयी पूरी .
निःसृत ,शांत वह तैर रहा निःसीम विलक्षण अम्बर में ..
मन जाग गया आनंद भरा पाया प्रकाश हर ओर भरा ..
अद्भुत जीवनअद्भुत था मरण,अद्भुत था  मन का जागरण ..
सीमाएं सारी टूट गयीं ,आकृतियाँ सारी फूट गयीं ..
केवल प्रकाश का रूपान्तर ..हो धरती ,जल ,अग्नि अम्बर ...


वह लोटा बन यात्रा पर विज्ञ,हर कर्म बना उसका अधियग्य..
 रहा वह अब करता -भोक्ता ,वह शेष मात्र अधिकृत  होत्रा.. मन  ने ज्युन्न यूं खोजा खुद को ,खोजा अपने अंतर्जग को .
उसका आधार निधान ,महत उसका उदगम आनंद अगम्य .
वह राग -द्वेष से परे जगत ,निःसीम शांत आनंद अनंत ..
द्वंदों का वहां है लेश नहीं ,अतृप्ति जहां है शेष नहीं ..
वह ध्यान मग्न हो खोता गया ,आनंदलोक में हो निमग्न ..
वाणी थी दिव्य था दिव्य बोध ,उसने माना वह शिशु अबोध ..
-"
तुम सपने को सच समझ रहे इस लिए दुखों में उलझ रहे ..
मैं दूर नहिं,पल भर भी तुमसे,तुम अंश मेरे सिन्धु के बिंदु !
भय त्यागो ,जागृत हो अंशी ! लो सुनो मधुर मेरी वंशी !
भयभीत  हो विचलित हो   ,मैं त्याग तुम्हे कर सकता  अपना मन बस मुझको देदो जो हो तन का तो होने दो ..
हो उदासीन ,निर्भीक ,निष्ठ ,मत पाप -पुन्य में हो प्रतिष्ट.
तुम मान से मत बांधो मन को ,अपमान से नहीं आहात हो ,द्वंदों से सदा परे रह कर बस एक मन्त्र को करो ग्रहण ..

"
इदं  मम '..इदं  मम यह मेरा नायह मेरा ना .!.
जो हैं अबोध ,भटके प्राणी वह ही कहते है -'इदं मम 'यह मेरा हैयह मेरा है ! मैं    हूँ यह!  मै  हूँ यह !.
'
मैं ' 'मेरा जो माने जग में,वह ही बंधते,दुःख पाते हैं ,जो त्याग 'अहम् मुझको प्रणते ,वह मुक्त तभी हो जाते है .
यह विश्व मेरे संकल्प से है ,अस्तित्व तुम्हारा मुझ से है .
मुझ को ही बस अपना जानो ,खोजो मुझको और पहचानो .
व्यक्तित्व से अस्तित्व की ओर  





व्यक्ति अभिव्यक्ति है त्रिगुणों की ,अस्तितिव की ज़रा खोज करो .
अस्तित्व शून्य से उपजा है ,हो शून्य ज़रा विश्राम करो .
मिट जायेंगे भ्रम -भय -संशयआनंद सिन्धु जब उमडेगा .
अंतःकरण का मधुर लोक जीवन ज्योतिर्मय कर देगा .
बस इतना सा कर्त्तव्य बोध तुमको विराट दर्शन देगा ..
सारे ग्रंथों का सार -बोध ,अपने ही अन्दर चमकेगा ..
जो सात बिंदु है शक्ति के वे सात आकाशीय स्तर..
मूलाधार है भूलोक ;स्वाधिष्ठान है भुवर्लोक ;मणिपूरक है स्वर्गलोक ;विशुद्ध चक्र है जनलोक .आज्ञा चक्र है सत्य लोक .
मस्तिष्क में छिपे ब्रह्म लोक ,विष्णु लोक  रूद्र लोक .
पर है कपाल का केंद्र बिंदु राधा -माधव का रासलोक.
जब बाह्य जगत का छोड़ मोह इन्द्रियाँ त्याग विषयों के भोग ,मन संग खोजती ईश्वर को ,चेतना तभी उठती ऊपर .
नीचे से ऊंचे केन्द्रों को .धरती से आगे अम्बर को ..
दर्शन होते अद्भुत जग केसुन पड़ती धुन अद्भुत,विचित्र ..
अस्तित्व बदल जाता है यूं हिम खंड पिघल जाता है ज्यूँ केवल जल ,तरल ,अरूप ,तृप्त , रहे वहां कोई अतृप्त .
जब प्राण उमड़ते हैं ,ऊपर आनंद लहर करती विभोर ..
सब देव वहां करते स्वागत  मन पाए खोया राज्य महत ..
गोलोक में छिपे रासेश्वर ,आनंद कांड सृष्टा -ईश्वर .
छवि उनकी कर देती प्रमत्त मन हो आतुर और उन्मत्त चाहे हो जाऊं विसर्जित अब ,क्या भला शेष पाने को अब ?चुन लेता है जिसको ईश्वर ,परवश वह हो जाता किंकर ..
महारास



जब भाव समाधी लगती है तब प्रेम की वर्षां होती ज्यूँ -
घन बरस निरंतर उमड़ घुमड़,ले बहा चले धरती को ज्यूँ .
बादल ,बिजली ,पागल मारुत ,मिलकर धरती को पिघलाते .
विचलित ,स्खलित  कर भू स्तर ,सागर में ज्यूँ पहुंचा जाते ..
पर ध्यान समाधि लगती जब ,चेतना शेष रह जाती है .
व्यक्तित्व विसर्जित हो जाता ,अस्तित्व बोध ही रह जाता .
 रूप , नाम ,  कुछ कर्त्तव्य ,एक मात्र शांत अस्तित्व बोध ..
 
वह महामोक्ष ,वह महाज्ञान वह महा रास को महा बोध !
स्र्तिष्टि के कण कण में मुखरित प्रकृति -पुरुष का युगल रास इच्छा स्फुरित ,होती पूरी  दे ईश्वर सत्ता का आभास ..
है पूर्ण ब्रह्म ,अदृश्य ,अनंत ,उसका  नाम , रूप . रंग ..
वह एक सत्य जो वर्णनातीत .वह मौन ,शांत परिवर्तन हीन .