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बुधवार, 31 जुलाई 2013

बुरा मत मानना

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आज तुझको गीत,
मैं गाकर पुकारूं
तू बुरा मत मानना ..
आज मेरे मीत, कह कर भी पुकारूं
तू बुरा मत मानना ..
आज तुझको मैं अभी अपना रही हूँ
कल अगर मैं रूठ जाऊं, गीत मेरे !
तू बुरा मत मानना ..
आज तेरे प्यार की नाज़ुक नमी के भार से
झुक रही पलके कहीं कल सो भी जाएँ
तू बुरा मत मानना ...
मैं तुझे सपना समझ कर भी भुलाऊं गीत मेरे !
तू मुझे अपना ही कह कर, प्यार करना
तू बुरा मत मानना ..

1982

मन के आंसू



न जाने कैसे हैं मन के आंसू ,कि दिखने लगता जहान सूना
ये आग कैसी जो राख करदे आदमी का हर एक टुकड़ा
मगर जिसे न देख पायें ज़माने भर की हज़ार आँखें
ये कैसा तूफ़ान कैसी आँधी ,की उडाता जाए मन का पंछी
हो कितना घायल ,चाहे अँधा ,न कोई आके सहलाये
ये एक सागर हो बर्फ़ीला या फिर हज़ारों लगें थपेड़े
की चाहे डूबो या खालो गश भी ,कोई न तुमको उबार पाए
तू मुस्कुरादे तो खुश है दुनिया भले ही दिल से हज़ार रोये
तू साथ बह ले तो साथी तेरे भले ही मन तेरा टूटे ,खोये

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नन्ही सी कलम



एक नन्ही सी कलम,
और नाज़ुक से गीत
कभी कभी अपनी
खामोश सदाओं से
यूँ ही पुकार लेते हैं
कहते है -भूल जाओ सब
कुछ पल जी लो
अपने करीब आकर
कोई गीत कहता है -
मेरे नज़दीक आके देखो
भुला दो कहीं कुछ और जो है
राख के ढेर, आँखों में उलझने के लिए
कांटे चुभने को ,फुल लुभाने के लिए
बहुत करीब आके देखो
मेरी गुमनाम खामोशी में
खुद को छिपा के देखो.
नन्हे मासूम बच्चे सा
बनके अनजान ,तेरी गोदी में
कभी सिमटा के अपने अंगों को
तेरे साए में समां जाना
फिर कुछ चौंक कर सिहर जाना
रोना मुश्किल है आवाजों में
होठों से बात का  मुकर जाना
बहते ,उमड़े गर्म अश्कों से
गीत का आँचल भिगो जाना

चन्द्रिका का पाश



चन्द्रिका के पाश में
क्यूँ डस लिया जाता ?
पुरुरवा बोलो -
तुम्हारा तेजमय मस्तक ,
तुम्हारा ओज माय जीवन
तुम्हारे शब्द का जादू
तुम्हारा योगमय साधन
सभी कुछ शून्य हो जाता
चन्द्रिका के पाश में क्यूँ
डस लिया जाता ?
तुम्हारा उद्यमी जीवन
बहुत निरुपाय हो जाता
तुम्हारा नीरव अंतर्मन
कोलाहलमय हो जाता
सभी कुछ भूलता जाता ..
चन्द्रिका के पाश में
क्यूँ  डस  लिया जाता ?
तुम उर्वशी के नहीं
आधुनिक पुरुरवा हो
दिनकर के नहीं
संघर्षमय युवा हो
न जाने कितने प्यासे हो
लहर में बहते जाते हो ..
तुम्हारी शक्ति भी तुम हो
तुम्हारी तृप्ति भी तुम हो
न खोजो उसको बाहर तुम
जिससे पूर्ण तुम खुद हो
अधूरी है असफलता
सफलता पूर्ण होती है
सफलता के उपासक हो
तो स्वयम में पूर्ण तुम फिर हो
1982

पीछे रखना अवसादों को ..

उतने ही प्रिय हैं ये आंसू
जितनी प्रिय तुमको मैं लगती
हैं ये भी उतने ही खारे
जितनी निष्ठुर मैं हूँ लगती
आंसू को जैसे मैं चाहूँ
बस एकाकीपन की खातिर
जैसे उनको पी जाऊं मैं
सबकी नज़रो से छिप छिप के
ऐसे ही नाता जोड़ा है
तुमने इस अद्भुत प्राणी से
क्या शब्दों में कह डालूँ मैं
इन बिखरी -उलझी बातों को
मन खुद ही समझ नहीं पाता
इन अनजानी सौगातों को ,
आंसू बिन आँखें हंसती हैं
फिर भी सूनी ही लगती हैं
ऐसे ही तो खोये हैं हम
अपने जीवन के आँगन में
ऐसे ही बस ढलने देना
जीवन की सुबह शामों को
पेड़ों के काले झुरमुट के
पीछे रखना अवसादों को ..
1982

मैं क्या बोलूँ


मैं क्या बोलूँ ,बतला दो तुम
गूंगे को स्वर दे डालो तुम
रीता है या मेरा जीवन
अपने रंगों से रंग दो तुम
कोई पीड़ा तो दे डालो
मैं जिस से मन को बहका दूँ
कोई अवसाद नया दे दो
जिससे अपना मन मैं भर लूँ
मुझको ऐसा ही दुःख दे दो
जिसको हर पल अपना लूँ मैं
मुझ को इतना तडपाओ तुम
खुद तड़पन ही बन जाऊं मैं
बिन आंसू के जीवन ही क्या
बिन पीड़ा के जीवन ही क्या
पीडाओं की गहराई में
क्यों न मुझ को दफ्नादो तुम
आंसू के उमड़े दरिया में
क्यूँ न मुझ को नहलादो तुम ?Image result for pics of volcanoes
1982

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

अन्तः सलिल

हर सुबह खिलते थे अम्बुज,दिशाओं में छाई थी शान्ति
सरोवर की गहराई में शंख -सीपों की बिखरी पांति
बदलती रहती हों ऋतुएँ ,वहां तो सदा एक सा था
न कहीं कोलाहल ही था ,न कही राग-द्वेष का नाम
न कलियों पर भ्रमरों का रोर ,न लतिकाओं पर नभचर नाद
शांतबहने वाली तरुणाई ,प्रात में उसे जगाती थीं
धरा की विश्रान्तियों से दूर ,कहीं छोटे से उपवन में
नित नई धाराओं के मध्य ,मूक वह विचरण करती थी
वहाँ के जितने प्राणी थे ,वृक्ष , तरु और सुकोमल बेल
सभी स्व अवलम्बित ही थे ,नहीं था कही किसी से बैर
इरा उन सब की साथी थी ,सभी से करती थी प्रेम
सभी उसके अपने ही थे ,नहीं कोई था तब तक गैर
जब कभी आते थे उत्सुक , उमगते हंसो के नव यूथ
बहुत क्रीड़ायें करते थे ,अनेकों भांति भांति के रूप
मुस्कुराया वह करती थी देख कर बोले पंछी को
बहुत चंचल सी कृतियाँ थी,इरा के मन के रंजन को
इरा ने वह भी देखा था ,और आकुल पंछी का शोर ..
भी कभी उसने देखा था ,बिलखते हुए कंठ का रोर ...
बहुत अंजाना सा दीखता था बिछुड़ने -मिलने का ये खेल
नहीं कुछ सच्चा लगता था ,सृष्टि में केवल है बस खेल ?
बड़ी सुलझी सी धरा थी, उस नए विकसित जीवन की
कहीं न कोई बाधा थी ,   व्यस्तता कर्मी जीवन की
नहीं था कुछ अतीत पर रोष, न कोई भावी सपना था
इरा का नन्हा सा एक मन ,ही बहुत उसका अपना था
धरा पर नहीं कोई स्थायी ,सदा प्रति पल परिवर्तन है
जो सदा -सदा रहा स्थायी ,मात्र वह परिवर्तन ही है
नियति का छोटा सा वह क्रम ,संतुलन तो फिर उखड गया
एक रसता के जीवन में    एक उत्तुंग शिखर बन गया
प्रकृति कुछ अधिक तभी मुस्काई ,पवन ने गीत कोई गाया
पल्लवों का सर्मर - सर्मर शब्द ,तब मन को छू पाया
नियति से अलग खड़े थे वृक्ष,झुका कर ऊंचे मस्तक को
धरा को छू ..छू... जाती थीं,  टहनियाँ फल दे देने को
तनिक सी आशंका की एक, कहीं कलिका मुस्काई थी
अपरिचित सा क्यूँ हैं सब आज ,वह समझ न पायी थी
इन्ही कुछ धाराओं के मध्य, कहीं वह बहती जाती थी
उधर नभ की ऊंचाई में, बदली इक उड़ती जाती थी
अरे किस अकुलाहट के साथ ,इन्द्रधनुषी रंगों के पार
साँवला बादल का टुकड़ा,  कर रहा था सूरज को प्यार
चौंक कर पीछे को देखा ,लताओं का पर पर्दा था
झाँक कर पीछे से देखा, उधर दीखा कोई अवधूत
तनिक संकुचाई थीं भ्रकुटी ,अधर पर फिर मुस्काये थे
अपरिचित खड़ा दूर उससे ,पग कहीं फिर सकुचाये थे
बहुत थोड़े से पल बीते,  बहुत थोड़े से शब्दों में
मित्रता उपज गयी उनमे ,यूँ ही इक  अनजाने पन में
भ्रमण करते थे बन कर मीत, उसी पहचाने उपवन में
अनेकों प्रश्नों के अम्बार ,जागते थे उसके मन में
अपरिचित की गहराई को, नहीं जाना था पगली ने
पूछती थी कितने ही प्रश्न ,अपरिचित पर बतलाता था
ज्ञान -बुद्धि की ही पहचान इरा तो बस कर पायी थी
कहीं छिपते हैं पर कुछ भाव ,नहीं  सोच भी पायी थी
कभी रुक जाते थे दोनों ,कभी फिर यूँ चल देते थे
नहीं था बोध कहीं भी मग का ,पग कहीं भी चल देते थे
दिखाता था अनजाना मीत ,अपरिचित अनदेखे संधान
सुपरिचित अपने ही घर में ,इरा बन बैठी थी अनजान
यूँ ही धीर धीरे करके ,कहीं तादात्म्य बन गया एक
विचारों के लघु मंथन में मैत्रि  का रत्न बन गया एक
हो उठा फिर वह चंचल ,बोलता था बन कर कुछ बोल
मुझे तो अब चल देना है ,विदा मुझको दो कुछ तो बोल
कहीं आकुल हो आयी वह ,मित्र के खो जाने को जान
तंतु कुछ जुड़ा कहीं ऐसा ,रहे दोनों ही बस अनजान
इरा का छोटा सा आग्रह ,रुक गया फिर उसका वह मीत
पलों के अन्तराल में ही कहीं उठ बैठा.. कोई ज्वार ..
हृदय की भाषा के अनुकूल ,लगा वह करने  उससे प्यार
सम्हाला कितना ही अंतस ,किन्तु बिखरे तन मन को देख
पी लिए उसका दिया विषाद, धुंधली सी समझौते की रेख..
                               ************
मुझे भुलावा दे कर चल दो ,तुम अनजाने द्वीपों को
मुझे सहारा दे कर छेड़ो,  तुम कुछ नूतन गीतों को
आज तुम्हारे लिए जियूंगी ,आज तुम्हारे आलंबन पर
अपना सब कुछ मैं रख दूंगी ,तुमको आज मनाऊंगी
प्रेम गीत सोये थे मेरे,  बरसों से हिम की परतों में
आज तुम्हारा ताप मिला है,  उनको पुनः जगाऊँगी
बह जाते थे मेरे आंसू,  किस रेतीली भूमि में
मुझे अभी जो ईष्ट मिला है, उस पर अश्रु चढ़ाऊँगी
कहीं खो चुके थे मेरे स्वर ,झंझाओं के नाद में
आज शांत एकांत मिला है ,नूतन राग सुनाउंगी
इरा स्वयं ही द्रवित हो उठी,क्षणिक प्रेम के मोह में
मन की अस्थिरताएं जागी, उसके कोमल कोष में
भावना की भंवर मध्य ,चक्रवातों में ज्यूँ खोयी
उसी एक बिखरे पल से ,मैत्री में पनपी ज्यूँ खाई
लगा ज्यूँ करदी कोई भूल ,फूल थे नहीं ,थे वे शूल
पलट गया पल में फिर चिंतन, बदली मन की धाराएं
पुनः लौट आयी थीं मिलने ,कटु यथार्थ की  सीमायें
अहो अपरिचित, कितने हो तुम ,मैं तुम को क्यों कर जानूँ ?
जाते ही आगंतुक के............. इरा सोच में डूब गयी
कभी मिला है मुझे प्यार क्या ,जो मैं तुम को अपनाऊं ?
मैंने अपना सौरभ खोजा , अपना प्रेम जगाया है
क्यूँ कर उसको मैं लुटने दूँ ,अरे, सुनो तुम आशा छोडो
अपनी डगरी पर जाओ ,अपने को जाकर तुम खोजो
अपने मन का प्रेम जगाओ ..अपने को समर्थ बनाओ
मुझे नहीं कुछ लेना देना ,झूठा है सारा बंधन
बहुत सहा है मैंने अब तक, इस मन का कातर क्रंदन
नहीं छिपाया भेद आज तक मैंने दुनिया वालों से
भला मुझे तुम क्या देदोगे अपने रीतों प्यालों से?
नहीं तुम्हारी बातों का मद,  मेरे मन को छू पाया
नहीं तुम्हारी प्रेम याचना का यह रूप मुझे भाया
नहीं मांगती तुम से मैं कुछ तुम भी भ्रम में नहीं रहो
नहीं कोई मैं दिव्य मूर्ति हूँ , दिवा स्वप्न में नहीं बहो
करुणा ,प्रेम क्षमा है मुझ में, फिर भी मानव मन ही है
मुझ में भी आक्रोश शेष है ,घृणा न सही 'स्व' तो है
अभी मित्र थी केवल कुछ पल पहले ,फिर दिव्या कहलायी
फिर कहते पाषाण हृदय हो ,नहीं तुम्हे जो अपनाती
और अधिक कुछ भी कह डालो ,सह लुंगी वह भी तुम से
कुछ हो प्रेम मिला था तुम से ,चाहे हो पल दो पल से..
 
           ***************
देख रही हूँ यही प्रेम है, मरू मरीचिका ही तो है
रेतीले टीलों से जैसे दो मन,मिल कर एक हुए हों
उड़ती ,पागल गर्म हवा से ..मिलते मिलते बिखर गए हों
जल की छोटी बूंदों से दो ह्रदय..कहीं पर घुले मिले हो
अपना ही अस्तित्व भूल कर ,आत्मसात कर बिसर गए हों
पर यथार्थ का तपता सूरज,उड़ा ले गया हो निर्मल जल
शेष रह गया हो फिर से बस,इच्छाओं का सूखा  बर्तन
क्या चला गया था सचमुच ही ,वह मीत छोड़ के उपवन को ?
लगने लगा वो अब बीहड़,   जहां पर खिलता था उपवन
दुर जब दृष्टि जाती थी..न दिखता था कोई किसी ओर
अन्दर से बाहर हर ओर ..एक ही छवि और कातर शोर
तुम कुछ तो कह जाते.. जाते ..जाते ..
जाना ही था तो फिर जाते...अपना  सब कुछ तुम ले जाते
मेरा कुछ भी न लेजाते..जाते ..जाते ..
पर गए कहाँ तुम ?  मेरी चेतनता को लेकर
अपनी प्रतिछाया छोड़ गए..चेतनता ज्यूँ शून्य हो गयी
स्वर के रहते मैं मूक हो गयी...तुम लौटोगे क्या कभी वहां ?
पद चिन्ह हमारे बने जहां ...शायद याद आने पर मेरी
तुम उस धरती पर जाओगे,पर तुमने ये कब जाना
तुमने मुझको कब पहचाना,अब नहीं रही मैं वहां जहाँ
तुमने कुछ मुझ से माँगा था,अब कुछ भी बाकी नहीं रहा
मिलन चिन्ह तो बदल गए ,अब अनजानी पहचानों में
तुम मुझे अपरिचित लगते हो,छोडो देखो अब भी जाकर
कोई उत्सुक सा बैठा है ..जैसे फिर कोई प्रतीक्षा में
सुन्दर सपने से बुनता है,मत रो देना उसके आगे
तुमने जो कुछ भी भुगता है.देखो यह क्रम बस चलने दो
मिलने दो और बिछड़ने दो,आते हो यादों से आंसू
मत उस स्थल पर गिरने दो,याद करो जब आंसू छलके थे
आंसू गिरने से पूर्व कहीं, आंसू आँखों के पी पी कर
दो ह्रदय वहीँ  पर छलके थे......



शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

विश्व नियन्ते,

विश्व नियन्ते,खीज उठा है
              आज विकल मेरा मन -प्राण
तुम कैसे मायावी हो कि
                     खेल करते खेल महान
अपने ही प्रतिबिम्ब अपरिमित
                       अपना ही सारा संधान
अपनी ही माया का जालक ,
                       स्व निर्मित गुणों का गान
मुझ से न छिप पाया अच्युत
                          तेरा मधुर विराट स्वरूप
कितनी ही बातों से तूने
                           दिखलाए हैं रूप अनूप
जिस छवि को मैं ध्यान रही हूँ
                            जिन रूपों को जान रही हूँ
नहीं प्रकट होता तू अक्षर
                          ओम यही बस जान रही हूँ
कितने रूपों में आ आकर
                                तुम मुझ को छल जाते हो
पहले मोहो फिर पास आकर
                                 दूर बहुत हो जाते हो
दे जाते हो फिर से मुझको
                              धाराएं नव चिंतन की
  कुछ में आंसू कुछ में पीड़ा
                               कुछ में रेखाएं दुःख की
दिया हुआ दुःख तेरा है
                             यह सोच सम्हल मैं जाती हूँ
सुख से अधिक मान कर दुःख
                            को निकट तेरे आजाती हूँ

1981Photo: Good night world ♥

मन -मधुकर


मन मधुकर न धोखा खाना,
                  मान कमलिनी का रे कहना
चाहे कितना तू मंडराना ,
                  चाहे तू जितना इठलाना
दिन भर नूतन खेल रचाना,
                   पूर्व समय तू भूल न जाना
संध्या का अनुमान करा देंगे
                      तुझ को अनजाने मीत
नहीं मिलेंगी मुकुलित कलियाँ,
                        नहीं रहेंगे मोहक गीत
सुन -सुन तेरा एक ठिकाना,
                    पूर्व रात्रि तू भूल न जाना
निशा आगमन के पहले तू
                       कमल कोष में आजाना
मन मधुकर न धोखा खाना
                        सही ठिकाना भूल न जाना

1981Photo

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

जीवन क्रम


आज
अपनी परिपक्वता से
मुझे कोई शिकवा तो नहीं
फिर भी जैसे
कभी होता है एहसास
उम्र की तरुणाईयों से
वंचित होने का अकस्मात
कभी अपने में व्यस्त
 किसी क्षणिक सुख की ललक
करती है विवश, पीछे मुड़ने को
एक बार फिर उन
 नाज़ुक पलों को ढूंढने को
न जाने कैसे धीरे धीरे
 चल कर आ जाता
 कर्म कुटिल जीवन
कैसे चुपके से छुट जाता
 भोलापन
हर अशांति ने मेरे मन को ललकारा
जीवन को धिक्कारा
मन ने फिर
 निश्चय कर डाला
अपनी निश्छलता को त्यागा
ताना बाना सा बुन डाला
जीवन को पुनः बदल डाला..
1981 Photo

रात्रि के स्वर


रात्रि
एक भ्रान्ति
कितनी शान्ति
फिर भी, अंतर में क्रान्ति
अधिक मोहक ,अधिक सरला
नीरवता में गूँजा करते
मौन भाव कुछ
शयन हेतु यदि यही यामिनी
जागृत क्यूँ मैं ?
मौन अरे मैं हूँ किन्तु
ये कैसे स्वर हैं ?
मेरे अंतस से उमड़े ये कैसे रव हैं ?
एक श्रोता बन गया है भाव' मैं 'Photo: Good night world♥ sweet dreams my dear friends ..का
आ रही आलोचनाएँ हर दिशा से
'यह ' वही क्या जो हवा के साथ बह ले ?
'यह ' वही शायद जो झंझाओं को झेले
एक पल जो साथ रह कर दूर हो ले ..
खोज में संतोष की हर और डोले ..
मूक हो कर 'मैं ' मेरा सुनता रहेगा
रुठते स्वर ..
प्रात होने तक
अनिश्चित भाव होगा
सुन सकूँ फिर ,पर
कहाँ अवकाश होगा ?
1981

शब्द रूठे


शब्द जब जब रूठ जाएँ
                  भाव फिर भी छाते जाएँ
                                स्वप्न पल पल मिटते जाएँ
                                                सत्य जब जब पास आयें ..
1983
Photo

विवर्त



पथ से बहक गयी थी
            मेरे अनंत प्रियतम !
पर आज  लौटती हूँ
               तेरे समीप प्रियतम !
वह कालिमा अंधेरी
                     अब टूटने लगी है
एक रात्रि तम में डूबी,
                    अब उबर रही है
मेरे रुंधे स्वरों में
                  अपने स्वरों को जोड़ो
लो टूटता अँधेरा
                 नव गीत मेरे जोड़ो
शाश्वत स्वरों में अपने
                 मैं गीत गाऊं  तेरे
मेरी रगों में बस जा
               तू प्राण बन के मेरे !
तेरी अभय प्रतीक्षा
              करती रहूँ सतत मैं
तू काव्य बन के बरसे
                उजड़े हुए भवन में
तू श्वांस बन के महके
               मेरे मदिर निलय में
तू भाव बन के बिखरे
                        स्पंदित ह्रदय में ..

1983
Photo: ♥

मुक्त पँछी


वह मुक्त कंठ पंछी
                  कुछ नाद कर रहा है
यूं चीर नीरवता
                 प्रतिवाद कर रहा है
क्यूँ बोलता अनर्गल ?
                क्या हास कर रहा है ?
या फिर, रुको, सुनूँ मैं ,
               क्या बात कर रहा है ..
ले स्वर उधार मेरे
              अभिव्यक्ति कर रहा है
खोये हुए ह्रदय की
                   हर बात को ग्रहण कर
वह इस अशब्द वाणी को
                      नाद दे रहा है ..

1983
रचना मेरा काम नही हैं, कवि या लेखक नाम नही हैं, हाँ, जब तुम मुझको पढ़ते हो एक काम कर पाती हूँ, भावो के दर्पण मे तुमको मैं तुमसे ही मिलवाती हूँ, कितनी इछाओ की नदिया कितने अरमानों के सागर बूंदों सी छोटी सी खुशिया और कुछ पीड़ाओं के गागर हां, जब तुम मुझको पढ़ते हो एक काम कर पाती हूँ, तेरी पीड़ा के भावों को मैं उर अपना दे जाती हूँ, शर्त यही हैं मेरे शब्दों को आकर पढ़ जाने की जो होती है एक वीर के बस सूली चढ़ जाने की जब जब आना, संग तुम्हारे हर भावो के सागर लाना स्वप्न अधूरे, तीव्र कामनाओं से पूरित गागर लाना और देखना दृष्टा होकर मैं कैसे और कब आती हूँ, शब्द तुम्हारे, हाथ तुम्हारे पर कविता मैं जन्माती हूँ ॥ <3 <3 <3

मानव -मन


सागर की लहरों से पूछा
              मारुत के वेगों से पूछा
कितनी गहरायी है तेरी ?
                  कितनी सीमायें है तेरी ?
मानव मन पूछा करता है
                    उत्तर की आशा न पाकर
अट्टहास कर उठता है
                   मैं किन्तु रहता है सागर
पवन पूर्व वत बहता है
                    किन्तु गूँज उठती है
अंतर्मन से यह प्रतिध्वनि अपनी
                    अपनी सीमाओं को जाना ?
अपनी गहराई को जाना ?
                   गहराई से भी गहरा है
सीमाओं से मुक्त सदा है
                  मानव का अपना अंतर्मन
कभी अकारण ही भर जाता
                  कभी उत्प्लवन करता है
कभी सुखों की छाया में भी
                       अदृश्य अग्नि से जलता है
कभी स्वयम पर इठलाता है
                   कभी ग्लानि भर देता है
बहुधा यूँ ही धोखे खता
                        जीवन रीता रह जाता है
बुद्धि की बाहों से छूटा
                         परिवर्तित धरा से टुटा
बंधन की कारा  से छूटा
                  सारी गतिविधियों से रूठा
मानव मन बहका करता है
                       मानव मन दहका करता है
1981
Photo: WoW Awesome Click ;)

- Nishant

दूर है


प्राण !
इतना तुम न बहको
दूर है मंजिल अभी ..
तुम
भटक जाना न फिर से ..
रात गहराती रही ..
प्राण मेरे !
हो के आहत भी अभी तुम
मृत्यु को मत चूम लेना ..
तुम अधर में झूल कर भी
छल भरी न प्रीति करना ..
प्राण मेरे !
दीप तू अपना जला ले .
तोड़ दे तममय
जगत की भ्रान्ति सारी
खोज पथ अपना ..
महिम अपने प्रणय का ..
टूटने दे स्वप्न पागल
जीवनी का ..
1983
Photo: Arches National Park in Utah.. Perfect Click !

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अनाम हूँ


मैं अनाम हूँ मेरे प्रिय !
            तू अनाम मीत है .
है अनाम प्रीत मेरी
                      इक  अनाम गीत है
है निः शब्द भाव मेरे
                 मूक मेरा कंठ है
है अगम्य रूप तेरा
                        तू अनंत रूप है
तू असीम ,तू अनंत
                     तू सदा सदा महिम
मैं अनित्य ,क्षुद्र हूँ मैं
                     तू निशा का दीप है
प्राण तू है भाव तू
                    विचार तू है कर्म तू
तू ही तू दिशाओं में है
                    तू ही नित्य मीत है
मैं भटकती हूँ युगों से
                   तू विचित्र मीत है
साथ रह के भी न दीखे
                   कैसी तेरी प्रीत है ?
रूप तेरे हैं अनंत
                      मैं सभी में खोजती
रूठता रहा है तू ही
                         मैं मनाती फिरी
छलना है तेरी नियति तो
                     सहना  मेरा स्वभाव है
तू रहे कठोर कितना
                   करुणा मेरे साथ है
तू अँधेरा बन के फैले
                    मैं निशा बन जाऊँगी
तू दिवस प्रकाश हो जो
                      मैं किरण बन आऊँगी ..
1983
Photo: Angel Cloud Photo Taken In Florida Recently!

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अंतर्द्वंद


री अवनि!
 क्यूँ छल रही
            आकाश को तू ?
                           घुमती -फिरती सतत
                                नियमित पथों पर
                              तू ,गगन के मध्य
                                 रह कर भी, अवनि ओ !
                                           छल रही नीले गगन को
                                                      वह गगन
पावन, विरल
             गंभीर रह कर ..
                 चाहता स्पर्श तेरा ही
                            निरन्तर ..
तू सदा ही क्रूर रह कर
                ओ अवनि !क्यूँ ?
                        कर रही पीड़ित सदा
                             प्रियवर गगन को ?


1983
Photo

झंकार


आज झंकारों में झंकार
                  आज पागल मन पागल प्राण
उठा कोलाहल कैसा आज ?
                     विकल होने लगता मन प्राण
नहीं सुन पाता कोई स्वर
                  नहीं कुछ ध्वनि की है पहचान
अनमना सा लगता संसार .
                       अपरिचित लगता हर संधान
खोखला सा लगता जीवन
                      धुंये में घुला  हुआ संसार ..
उमड़ता अनजाना तूफ़ान
                        बिना पानी बिना मंझधार ..
बिन दस्तक खुल जाते द्वार
                        निकल जाती मुंह से क्या बात ..
शेष छिप रह जाते जो भाव
                       लेखनी ने कब किया  छिपाव ?
बचा रह जाता उजड़ा गाँव
                      बाद में लुटने के कब ठाँव ?
बिजलियाँ जब भी चमकी हैं
                      अँधेरा गहराता जाता ..
वह काला पावस बादल- दल
                    अधिक उमड़ाता घुमड़ाता
कभी सूखे से उपवन में
                    मलय संदेसा दे जाता
सुरभियों का झोंका आकर
                       सुखद स्मृतियाँ दे जाता ..
1981
Photo

आत्मनिष्ठ

आज,
        फिर से शान्ति है
                छाई हुयी
                    मेरे जगत में ..
छिप विहग के पंख में
                अब उड़ चले
                      आक्रोश के तृ ण ,
                             भावनायें सुप्त हैं
उद्दाम लहरें मिट चुकी हैं
                  धीर सागर नीर में ..
                      प्राण हैं निः शेष केवल
                         मैं अनन्य भाव हूँ .
उज्ज्वला हूँ ..
                दीपिका हूँ ..
                      गीतिका हूँ ..
                               काव्य हूँ ...
शांति का विस्तार है
                       और प्रेम मय
                               साम्राज्य है
                                   शासिका निर्वेद हूँ ..
सत्ता      हूँ   मैं
                     साम्राज्य    हूँ ..
                              द्वैत से    अब हूँ परे
                                           एक निष्ठ प्राण हूँ ..
1983
Photo

मयंक


मैं शांत यामिनी हूँ
                  तुम हो मयंक मेरे !
घनघोर कालिमा हूँ ,
                   अविरक्त श्यामली हूँ
तुम ज्योति पुंज मेरे
                  तुम हो मयंक मेरे !
1982
Photo

प्राण मेरे !

प्राण मेरे !
            खोजती हूँ
                   मैं तुझे ही
  आज भी मैं हूँ
                 अपरिचित ,
                  विश्व में इस !
तू कहाँ जा
            खो गया है
                       दिव्य मेरे !
आज भी
           मैं तो तुझे ही
                   खोजती हूँ ..!
प्राण मेरे !
                ज्ञात मुझ को,
                            भाव तेरा !
मैं स्वयं अज्ञात हूँ
                  सत्य है तू एक मेरा
                       मैं तो मिथ्या गात हूँ !
1982
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अंतर्लाप



आओ, दोनों साथ बैठें
मैं कहूँ तुम सुनते जाओ
बस निरंतर ..
या कहो तुम और
फिर, मैं मूक होलूँ ..
टूटने न दो अपितु
यह तान अब तो
रात्रि का क्रम टूट जाए
तब तलक तो ..
प्रश्न जब उठता ,
नहीं उत्तर मिला है
जब सुनूँ न मैं
तो तुम क्यों बोलते हो ?
बड़े अद्भुत हो मुझ में
बसने वाले रूप मेरे !
नहीं देखा.. .फिर भी ,
तुम्हे है रूप माना
नहीं अनुसार मेरे
चल रहे फिर भी
हो मेरे ......
तुम्हारा साथ, सच मानो
बहुत दुर्लभ मुझे है
जुड़ा एकांत से है साथ
मेरा हेतु तेरे ..
नहीं तू बोलता कुछ ..
जा तेरी इच्छा ..
रहेगा आमरण तू साथ मेरे
यही तो सत्य है एक
न कि मेरी कोई इच्छा ..
1981

मुक्ति दे !


मुझे मुक्ति दे ,
          मेरे अच्युत !
              बंधन क्यूँ हो
                   जीवन मेरा ?
जीवन में ही
               मुक्ति दे ..
                    मृत्यु तो नहीं
                          द्वार मुक्ति का
                मुक्तिमय
                            जीवन कर दे ..
1983
Photo

खोज


मैं फिर भटक न जाऊं
                  मेरे अनंत प्रेमी !
तू क्रूर तो नहीं फिर
                   क्यूँ मूक हो गया है ?
कितना पुकारती हूँ ..
                  तू फिर भी खो रहा है ..
यूँ तो मैं तेरी हूँ ..
                    फिर भी भटक रही हूँ ..
तू छिप गया है क्यूँ कर ?
                    मैं खोजती फिरी हूँ ..
1983

Photo

महाप्रणय

Photo: सुधि का दिया जलाए साथी जोह रही हूँ बाट तुम्हारे, मन का पीर' सुनावुं किसको तुम ही तो मन-मीत हमारे, तुम निर्बध प्रीति की संज्ञा, बनकर मेरा मन बहलाते, अपने मधु-मिश्रित बातों से, मेरे तन मन कों नहलाते, गहरे नींद नयन में आकर, हमने मधुर संजोए सपने, कोई दूजा और नहीं था, बस तुम थे, हाँ तुम  मेरे अपने, जब से आए हो जीवन में, मन का ये मधुमास खिला है, जिस्म दो होकर भी क्या है, दिल तो अपना एक मिला है'  कितना कठिन भुला पाना है, प्रिय तुम्हारी इन सुधियों कों ? तेरे चिंतन के सम्मुख  मै समझू ओछी सब सिद्धियों  कों...ॐ <3



 दीप जलाती
            महाप्रणय का
               पंथ निहारूं महादेव का ..
वह श्यामल,
          घातक अँधियारा
                 मेरे उर का
दीपशिखा सा
              यहाँ प्रज्ज्वलित
                 प्रेम देव का ..
विघ्न वरुण
           मत कम्पित कर
                       तू प्रेम शिखा को ,
अविचल ,
      ज्योतिर्मय अनंत 
                 कर दीपशिखा को ..
तृण -  तृण
            आलोकित कर दे
                         तू ह्रदय -नीड़ का ,
कण -कण
              स्वर्णिम बन चमके,
                           मेरे मंदिर का !
दीपशिखा सा
              यहाँ प्रज्ज्वलित
                            प्रेम देव का ..!
आह ,प्रतीक्षा
            महिम तुम्हारी !
दुर्गम पथ ,
             विचलन, लाचारी !
शाश्वत ,दुर्लभ प्रेम ईश का
                  चिर नवीन शुभ,  स्वप्न प्रणय का ..
                            दीप  जलाती महा प्रणय का ..!
1983

दिव्य पथ



मैं पथिक हूँ दिव्य पथ की
क्या मुझे ठग पाओगे तुम ?
मैं प्रिया हूँ उस महिम की ,
क्या मुझे छू पाओगे तुम ?
शान्ति अनंत अनंत ...
अविराम निर्झर निर्गमित है
प्रेम का ..विश्राम का ..
मैं उसी रस की हूँ रसिका ..
क्या मुझे दे पाओगे तुम ?
प्रेम है विश्राम है
आश्रय है ,न संताप है ..
तृप्ति ..संतृप्ति ..सदा दे
मैं उसी जल की हूँ तृषिता .
क्या तृषा हर पाओगे तुम ?
मैं पथिक हूँ दिव्य पथ की
क्या मुझे ठग पाओगे तुम ?
1982

मुक्त आज कर दे


मुक्त आर कर दे तू मुझ को ,आँसू बन कर बहने दे ..
आज अलग     करने     दे        मुझ को झूठी परतें
मुस्कानों से दूर कहीं, केवल अब क्रंदन करने दे ..
मुक्त आज कर दे तू मुझ को आँसू बन कर बहने दें ..
आह ,आवरण हर ले मेरा ,निकट सत्य को रहने दे ..
क्यूँ फिर मिथ्या रूप दिखाऊँ ,मुझे अनावृत रहने दे .
छल- मल नहीं सहन अब ,निश्छल जीवन जीने दे
थी बहुत पिपासा विष की ही , अब अमृत के कण भी दे
मुक्त आज कर दे तू मुझ को आंसू बन के बहने दे
मुझ को आंसू बन बहने दे ,आंसू का सागर बनने दे
मुझ को फिर मंथन करने दे ,सागर से मोटी चुनने दे
मुक्त आर कर दे तू मुझ को आंसू बन कर बहने दे
.

1983
कुछ अनकही
      ...........7............
दिल के कागज पर
                आँसू की स्याही से,
अपने दर्दे दिल को लिखा| 
                यह सोचकर कि,
कोई दर्द को मेरे अपना सा समझेगा,
                और पढ़कर रो देगा|
लेकिन इंतिहाए बदक़िस्मती देखिए,
                पढ़कर दर्दे दिल को,
नही निकली उसके होंठों से 'आह'
                बस इतना ही कहा उसने 'वाह'!
सुनाएँ तो दिल का हाल किसे सुनाएँ,
                जिसे बताते हैं वोही मुस्कराता है
अजीब सी निगाहों से हमें देखता जाता है
                क्योंकि हमें जैसा लिखा पाता है
हक़ीकत में वैसा हम में कुछ नहीं पाता है
                लेकिन अंजान है वो इस बात से,
की हाथी के दाँत इंसान भी लगाता है|
                असल में होता है कुछ और है,
लेकिन दिखाया कुछ और ही जाता है||
               .............यशपाल भाटिया [3.1.1998]

सागर -मन


क्यूँ छलक रहीं शब्दों में
मन के सागर की लहरें ?
क्यूँ उमड़ -घुमड़ कर
अब भी ,आते तूफानी घेरे ?
मेरे आँगन के बादल ,
पानी मुझ पर बरसाते ,
मेरी बंजर धरती को ,
पर प्यास ही कर जाते ..
1982
Photo: Good morning world 
have a nice day ♥

शाश्वत प्रेम


शब्द कैसे कह सकेंगे ?
प्रेम की शाश्वत कथा यह ..
कोष वहन कैसे करेंगे ?
प्रेम की मधु मय सुधा यह ..
जिस निखिल के प्रेम का
मधुपान मैं करती रही हूँ .
उस मधुरतम भाव को
व्यक्त क्या अक्षर करेंगे ?
1985

क्षितिज मुस्काया


आज क्षितिज मुस्काया मेरा
आज उषा ने डाला डेरा
बादल छाये ,घिर -घिर आये ,
ढाँप क्षितिज शिशु रजनी सोयी
दामिनी कुपित होए शिशु रोये ,
अश्रु बहाए क्षितिज मेरा ..
बादल छटे ,लौट गयी रजनी ,
मिटा निराशा का अँधेरा ..
मुक्त हुआ ,मुस्काया अम्बर
आने को है सुखद सबेरा ..
आज क्षितिज मुस्काया मेरा ..
1985

Photo: BY Sergey Smirnov

गीत गाओ प्राण


प्राण मेरे गीत गाओ ,
तुम रिझाओ विश्व को ,
फिर तपो फिर और निखरो
तुम मनाओ ईश को !
त्याग कर मैले वसन ,
धारण करो नव वेष ,
हाथ थामों प्रेम का ,
अब भूल कर के द्वेष ,
हो सुखी -सानन्द अब ,
सुखमय बनाओं विश्व को ..
वह तुम्हारा ध्येय ,प्रेमी
प्रभु बसा है विश्व में ,
पास लाना है उसे तो ,
प्रेम पान है तुम्हे तो
पास लाओ विश्व को ,
प्रेम दो तुम विश्व को ..
प्राण मेरे गीत गाओ
तुम रिझाओ विश्व को ..

1985Photo: Good night world ♥
Golden dreams my dear friends ♥
 

प्रेम तुम्हारा ,

प्रेम तुम्हारा ,इतना अद्भुत .
कर देता मधुमय सँसार !
क्षण भर पहले शुष्क था जगत ,
रस -विहीन था हर सँधान .
मन विक्षिप्त था ,प्राण थे मलिन ,
मात्र साथ था रोष विकार
उत्पीड़न की छाप प्रखर थी ,
जटिल यातना उभर रही थी ,
भयाक्रांत था मानस आज ,
अन्धकार था दुर्निवार ..
जिस पल प्रेम तुम्हारा पाया ,
मिटा ह्रदय का दुःख मय भार ,
एक अनूठा ज्वार सा उठा
बना मधुर मेरा सँसार ..
रोम -रोम उल्लसित हो उठा ,
अंग -अंग में सौरभ वास ,
मन उत्प्लावित हुआ स्वतः ही
मेरे सुख का सुंदर सार ..
1985

निर्मल निर्झर


मन के अन्तर्तम से उद्भित ,
आज हुआ रस मय निर्झर ,
प्राणों का संताप धुल चला ,
ज्यूँ निकला निर्मल निर्झर !
याद नहीं कब दुःख मिला ,क्यों ?
याद नहीं कब रोष पला , क्यों ?
अब न तम -भव -भय ही याद ,
मल -छल ,पल -पल स्वतः धुल चला ,'
ज्यूँ निकला निर्मल निर्झर ..
क्यूँ छाया था अन्धकार ?क्यों
भटके इतने मेरे प्राण ?क्यों
अनजानी प्यास जगी थी ?क्यों
था दुखों का न पार ?एक पल में
सब त्रास मिट गया ,
ज्यूँ निकला निर्मल निर्झर ..
मन के अन्तर्तम से उद्भित ,
आज हुआ रस मय निर्झर ,
प्राणों का संताप धुल चला ,
ज्यूँ निकला निर्मल निर्झर !
1985
Photo: Aurora Corona
पीड़ा का अतिरेक ,
विह्वल कर देता मानस- देश,
ह्रदय की कोमल अवनि पर उभर आते कंटक अनेक ,
कंटकों का चिर परिचित साथ,
 सदा देता रहता आघात ,
करूँ आलिंगन काँटों का,
विह्वल कर देता शून्य प्रदेश !
व्यथा का ताप,सलिल से भाव ,
उमड़ते श्यामल घन की भांति ,
अंक में पूर्व स्मृति दुति ढाँप ,
ह्रदय -सागर से ज्यूँ चुपचाप ,
आसवित हो दृग कोरों पर
प्रवाहित होते ,ज्यूँ अवशेष !
पीड़ा का अतिरेक
विह्वल कर देता मानस देश !
1985

चेतना के द्वार



मूंद कर दृग द्वार खोलूँ चेतना के द्वार ,
मैं सुरभि सी आज डोलूँ बन्धनों के पार ,
मैं भुला कर विश्व सारा  तोड़ सब से मोह ,
सिमट कर प्राणों में अपने,छोड़ दूँ व्यामोह ,
फिर अनिल सी हो प्रवाहित, विचरूँ सब के द्वार
प्राणमय उच्छ्वास बन दूँ विश्व को निज प्यार ,
मूँद कर दृग द्वार खोलूं चेतना के द्वार ..
शुभ्र दामिनी सी दमक भ्रम बादलों के पार ,
मैं मिटा मस्तिष्क नभ का अज्ञानमय अँधकार ,
फिर गिरूँ आकाश से कर कान्ति  का श्रृंगार .
भस्म कर दूँ चिर निहित दुर्वृत्ति मय संसार ..
मूंद कर दृग द्वार खोलूँ चेतना के द्वार ..
मैं सुरभि सी आज डोलूँ बन्धनों के पार ..
1985

गीता गीत


तिमिर -तिमिर ,घन तिमिर तिमिर्मय
जग -जीवन -मन -प्राण तिमिर्मय ,
विस्मृत सत पथ ,विस्मृत सद पथ ,
विस्मृतिमय संसार तिमिर्मय !
ज्योत प्रज्ज्वलित गीता रूपी
गीता से संसार ज्योतिर्मय !
नीरस रजनी ,नीरस संध्या
विवश उषा है विकल है दिवा
है अशांत -आक्रांत -मलिन मन
जीवन का परिधान मलिन मय
रस सरिता है निर्मल करणि ,
गीत ही  है शाश्वत तरणि !
1985

दीप जला दे न !


अँधियारा छाया है मन में ,
आकर दीप जला दे न !
गहन कालिमा व्याप्त हुयी है ,
तू ही ज्योति जगा दे न !
दुविधा -आशंका -अस्थिरता ,
विस्मृति -क्रंदन -अधीरता ,
आहात है मन, आहत जीवन,
मुझ में समा ,करुणा कर न !
Photo

संकल्प


भावना का तेज झोंका,
बन के आये तुम
कभी अंधियारे ह्रदय में
तीव्र दामिनी से
 हो चमके तुम ,
प्रेरणा बन के कभी
मुझ में समाये हो
कभी विकृति बन ,
सताने भर को आये हो
दूर जाते हो कभी तुम
पास आये हो
भूल जाते हो कभी
तुम याद  आये हो ,
बन के बादल छाये हो
मेरे गगन में ,
तुम हो बरसे उमड़ कर
मेरे नयन से ,
धूल कण से आँख में
उलझे रहे तुम ,
फूल बन कर ,पर
नहीं महके कभी तुम
शलभ से मंडराए हो
मेरे ही परितः
पर सुहृद सा साथ
कब दे पाए हो तुम ?
लहरों की तरह मेरी \
तरणि को ठेला ,
बनके नाविक खेने
कब आये हो पर, तुम?
व्यर्थ है छलना तुम्हारा
तुम स्वयं अनजान हो ,
मैं नहीं वह जो
दुखो से हार जाए
या परिवर्तनों से
ऊब जाए ,डूब जाए
मुस्कुराना है
मुझे और जीते जाना
मुस्कुराना और
दुखों से जीत जाना !

1984

विराट को पा


प्रतिपल प्रियतम के समीप आ ,
पल प्रति पल प्रभु के समीप आ ,
पावन हो मन पावन जीवन ,
आह्लादित -पुलकित -प्रमुदित तन ,
शब्दों से बांध पाए जो न ..
उस विराट ,अद्भुत को पा
महामलिन है तेरा जीवन ,
महाछद्म है तेरा भाषण
महा भ्रांत है बुद्धि तेरी
मल -छल से मुक्ति पा

Photo

क्यूँ पीछे देखूँ ?


क्यूँ मैं पीछे मुढ़ कर देखूँ ,
दलदल भरे वनों की ओर ?
दीप सामने जलता मेरा ,
चलूँ न क्यूँ अब उसकी ओर ?
अब ज्या रात छाये या दिन हो ,
मेरे पथ पर दिव्य किरण है
छाई हुयी मेरे हर ओर ..
क्यूँ मैं कीचड़ में अब उतरूँ ?
कमल आ रहा मेरी ओर ..
क्या उस मलिन रात्रि में खोजूँ
ज्योति प्रज्ज्वलित मेरी ओर ...
खोज रही थी जिसे आज तक
वही आ रहा मेरी ओर ..
Photo

किस से प्यास बुझाऊँ


तुझ सा मीत कहाँ से लाऊं ?
तुझ सी प्रीत कहाँ से पाऊं ?
तुझ से प्रेम तोड़ कर अच्युत ,
किस से प्रेम बढाऊं ?
प्रतिक्षण अंतर्मन से उद्भव जिसका,
दे जो महका तन -मन ,नव प्रभात
दे अंतर्मन को ,उस स्वर्णिम'दिनकर
से बढ़ कर, किस में ज्योति पाऊँ ?
बंजर सूखा जीवन -प्राङ्गण ,
सतत तृषित पत्थराई अवनि ,
आस त्याग श्यामल नीरद की ,
रस से सिक्त करे जो अवनि ,
किस से प्यास बुझाऊँ ?

यूँ तो वो सबके हैं 
मगर केवल मेरे हैं
तभी कहता है इंसान 
जब पूरा उसमे डूब जाता है जैसे गोपियाँ ……………


तुम केवल मेरे हो ,
आँखों के कोटर मे 
बंद कर लूंगी श्याम 
पलकों के किवाड लगा दूंगी 
ना खुद कुछ देखूंगी 
ना तोहे देखन दूंगी 
ये मेरी प्रीत निराली है 
मैने भी तुझे बेडियाँ डाली हैं 
जैसे तूने मुझ पर अपना रंग डाला है 
अपनी मोहक छवि मे बांधा है 
अब ना कोई सूरत दिखती है 
सिर्फ़ तेरी मूरत दिखती है 
मेरी ये दशा जब तुमने बनायी है 
तो अब इसमे तुम्हें भी बंधना होगा 
सिर्फ़ मेरा ही बनना होगा ………सिर्फ़ मेरा ही बनना होगा 
अब ना चलेगा कोई बहाना 
ना कोई रुकमन ना कोई बाधा 
मोहे तो भाये श्याम सारा सारा 
मै ना बांटूँ श्याम आधा आधा

भ्रमजाल


तोड़ दे ,प्रिय सारा भ्रम-जाल,
भेद भव -रजनी का तम-जाल
जगादे विश्व प्रेम की ज्योति ,
मिटा दे जीवन से व्यामोह!
मलय दे आहत प्राणों को ,
तरल कर दे जन मानस को,
मिटा दे क्लेश ,द्वेष, संग्राम
बहा निर्मल निर्झर अविराम !
1984

मुक्त जीवन


क्या करूँ मैं ,
उस मिलन का
वासनाएं जो
 जगा दे
तू मुझे, विरहा ही दे
 जो
मुक्ति मय
 जीवन बना दे !

किस किस से पूछा, कहाँ - कहाँ  खोजा, मंदिर , मस्जिद, गिरजा -गुरुद्वारा'' कहाँ नहीं उसको पुकारा? किसी ने कहा तप करो, जलाओ वासनाएं जप करो, करो मन को शून्य, हो अहंकार का नाश, हो जाओ  सन्यासी' करो एकांतवास!  भिन्न-भिन्न, पथ पर चलते-चलते थक गयी, पाँव हुए भारी आँखें झपक गयी, शांत हुयी इन्द्रियाँ,मौन हुआ मन, तभी हाँ तभी अनन्त विश्रान्ति, के विलास में, छलके ज्योति कलश, प्रकाशित हो उठी दिशाएं, चमक उठी शिखाएं, गतिशील हुए स्पंदन सात्विक! अब भला कैसे टिकता तमस का उन्माद ? ह्रदय में बजने लगे अनहद नाद , आनन्दित ह्रदय के कोने  में एक साथ उतर आए ,सूर्य चन्द्र और तारे....अब सामने आलोकित- लोक था हमारे'' । शुभ-प्रभात मित्रों ! आप सबों का दिन मंगलमय'' हो ये है, शुभ कामना हमारी...ॐ !

व्याकुल अंतस


फिर से व्याकुल अंतस मेरा,
फिर से प्राण अधीर हुए हैं.
फिर से तुझ पे रोष उमड़ता,
फिर से दृग,मयनीर हुए हैं,
सुख का तो आभास मात्र है ,
दुःख के श्यामल मेरु खड़े हैं,
संतुष्टि का स्वप्न शेष है ,
अतृप्ति मय मार्ग पड़े हैं .
फिर से रिक्त हो चला है मन,
फिर सब बंधन चटक गए हैं .
पाने की आशा धूमिल है ,
खोने के अनुभव कितने हैं,
स्वप्नमयी सृष्टि का छल है,
छल -जल से घट भरे हुए हैं,
फिर दुःख सिक्त हो चला जीवन ,
फिर आशा तृण बिखर गए हैं,
फिर से व्याकुल अंतस मेरा,
फिर से प्राण अधीर हुए हैं !
1984
तुम्हारी याद कब जुदा हुई मुझ से ..!
ना कोई ऐसा पल गुजरा जो तुम हुए हो जुदा हमसे ..!
जब तुम याद ना आये हमे कोई ऐसी सुबह ना खिली  ..! 
तुम को खुद से दूर कर पाए ऐसी कोई धूप ना मिली  ..!
संग तेरी याद के कोई ली'चाय' हो ऐसी शाम ना हुई ..!
रात में यादों संग चांदनी में 'ना'नहाये कोई रात ना हुई ..!
यादों के काफिले का 'कफ़न' ना ढक ले मेरी यादों 'चमन' ..!
तुझको मेरी मोहब्बत की कसम अब तो आजाओ सनम .."ओ मेरे सनम"..!अनु

मैं


किसी ने फूल कहा तो
किसी ने पत्थर मुझ को
किसी ने दूर से देखा ,
किसी ने पास आ कर ,
किसी ने प्यार बरसाया
समझ कर प्रेम की सरिता
किसी ने शब्द -वर्षा की
समझ कर रूप -गुण राशि ,
किसी ने छीननी चाही
मेरे व्यक्तित्व की गरिमा
किसी ने की बहुत कोशिश
मुझे पंकिल बनाने की .
कोई बोला- कि निर्झर हो ,
कोई बोला- कि पतझर हो ,
किसी का स्वस्ति वाचन था ,
कोई बोला - निकम्मी हो !
सदा ही खोजती रहती अपनी
परिभाषा, नहीं पाया कभी अब तक
किसी को अपने ही जैसा .
कभी पाया की सब कुछ हूँ जो
लोगों ने कहा मुझ को
कभी समझा अकिंचन हूँ .
जो सच है मानती हूँ अब
मैं तो विचरती हूँ
है विपु तो मात्र एक वाहन
मैं आत्मा हूँ, अनश्वर हूँ
सदा उन्मुक्त फिरती हूँ
कभी फूलों में छिप बैठी
खिला यह मुग्ध तन वाहन
कभी चाहा हो परिवर्तन
हुआ पंकिल कभी वाहन
कभी मंदिर में खोयी हूँ
कभी निर्जन  में रोई हूँ
कभी भीगी हूँ वर्षा में
कभी तपती दोपहरी में
स्वयं पे मुग्ध रहती हूँ
सदा संतृप्त रहती हूँ !

1984

थामा मुझे


जब भी गिरने लगी
              आके थामा मुझे
तुमने गीत मेरे !
                जब भी बहकी,
तुम्ही ने सहारा दिया ,
                जब भी बहती हूँ ,
रोक लेते हो तुम .
             जब भी प्रतिशोध
उमड़ा है मन में कभी
             तुमने आकर नयी
 सीख दी है सदा !
                जब भी आक्रोश,
 मुझ को निगलने लगा
                  आके तुमने ही
मुक्ति दी ,शान्ति दी .
             आज भी, एक
तुम ही सहारे हो ,
               है बफा क्या ,
तुम्ही ने सिखाया मुझे !
                  तुम से बढ़ कर
बफादार है कौन और,
                जब भी भटकी
सदा प्यार मुझको दिया
                  जब भी गिरने लगी
 आके थामा  मुझे
              तुमने गीत मेरे !
1983
Photo: Good morning world ♥

नियति


एक शौक रहा है मेरा -
                  साँपों को दूध पिलाने का ,
साँपों को मैंने पाला है ,
                    साँपों को दूध पिलाया है ,
बदले में एक नहीं, कई बार
                     बस सर्प दंश ही पाया है .
फिर भी ,सर्प विष पी लेती हूँ
                       और दूध पिलाती रहती हूं .
1983

अभिलाषा


हर चेहरा खिलता फूल बने ,
हर जीवन शाश्वत गीत बने ,
हर प्राणी खुद को पहचाने
हर मानव अपना मीत बने !
खुद को इतना मत बहने दो ,
खुद को न दुर्बल होने दो ,
तुम क्यों इतने दयनीय बनो ?
तुम शक्ति मुखरित होने दो !
कितना खुद को तड़पाते  हो ,
खुद को ही छलते जाते हो ..
मत अपना ही उपहास करो
जीवन का न दुरपयोग करो !
वह मूर्ख ही जो छलता है ,
दुर्बल है वह जो जलता है ,
कायर ही निंदा करता है
उपहास करें ,वे रोगी हैं !
दुर्वृत्ति के न दास बनो,
दुर्बुद्धि वश न नाच करो ,
सोचो समझो खोजो खुशियाँ
जीवन अपना आबाद करो !
मुझे चाहिए शाश्वत जीवन ,
हर जीवन को प्यार मिले
हर प्राणी खुद को पहचाने ,
हर मानव अपना मीत बने !
1983
Photo: Good morning world ♥

पीना सीखो


जीना है तो पीना सीखो
                     पी पी कर के जीना सीखो
विष ग्रंथियाँ जो बन चुकी
                      ज़िंदगी में ,तुम उन्हें  पी लो
मत बाहर उगल दो ....
                          विष मय उपहार मत दो
दूसरों को ,तुम विष पीलो
                          जग को मधुर रस दो ....
1983Photo

गुनाह


कई बार गलतियाँ नहीं की
फिर भी सजाएं मिल गयीं
बेगुनाही ही एक ,
गुनाह बन कर रह गयी
गलतियाँ नहीं की फिर भी
सज़ाएँ मिल गयीं
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