फ़ॉलोअर

सोमवार, 15 जुलाई 2013

अंतर्मन

रोको न प्रिय इस धारा को  मैं जिसमे बहता जल कण हूँ 
मैं नहीं बुलबुले से बढ़ कर ,बिखरा जो फिर संवरा बन कर 
मैं इस में बहती जाती हूँ ..हूँ  इस प्रवाह में डूब  रही 
मेरे मन का यह झरना ,आँखों से नीर निकलना है 
यह त्वरित कभी है मंद कभी है स्मृति भी ,निर्झर भी 
अद्भुत बहती यह धारा है है हिमकण भी हैस्फुलिंग भी  
यह दिग दिगंत विस्तीर्ण हुयी अविरल ,अक्षुण .प्रवाह मयी 
तुम शिलाखण्ड इस निर्झर के ,तुम उद्गम हो तुम केंद्रबिंदु 
मेरा या वेग अपावन मन है एक बिंदु तुम महासिन्धु 
तुम शांत तरल ,गंभीर उदधि ,लहरे उठ कर हो शांत जहां 
मेरा यह भग्न ह्रदय आकर पा जाए अक्षय शान्ति जहां 
हे उदधि ! बनो उद्देश्य मेरे उड़ते ,तिरते पागल मन का ..

1977
Photo

तुम


तुम एक किरण हो मेरे सूने  आँगन  की 
तुम चन्द्र किरण मेरे लहराते सागर की 
तुम मधुकण हो मेरे निर्गंध सुमन के 
तुम अमृत कण मेरी इस रीती गागर के 
1977

पलकें


पलकों को तेरी झुक जाना बस पल भर को 
श्वांसो को मेरी थम जानो था पल भर को 
पलकें उठ कर फिर दृष्टि मिलना पल भर को 
श्वांसो को मेरी रुक जाना जीवन भर को 
जीवन का जैसे बढ़ जाना अमृत पथ को ..

1978

धुआँ

कहाँ से उठता है ये धुआँ ,क्यों ?
छा जाता है सर से पाँव तक ,
जिसकी बदबू फ़ैल जाती है 
चारों और मेरे और ठंडा हो कर 
जन जाता है कालिख की तरह 
उसे जब जब कुरेद तो 
किर  किराने लगता है वह ..
1977
Photo: Awesome !!!
Angelღ

कविता


 दर्द उठता हो किसी कोने में 
सारी बत्तियां जैसे बुझ जाती हों 
कुछ सुलगने लगता हो सारे कमरों में 
झरोखों  में दम घोटता धुआँ आकर 
जम जातो हो ,बहने लगता हो 
कोहरे भरे पागल मोहल्ले में 
कुछ झोंके पागल हवा के 
बर्फीले से माहौल में 
फिर किसी लौ का जल उठना 
रोशनी और अंधेरो का कूच कर जाना 
और फिर 
कविता बन जाना ..
1977
Photo: Snow tunnel in Russia !
Angelღ

गुरुवार, 13 जून 2013

श्री राधे 
 मूक हूँ अभिभूत हूँ !
युग युगांतर की तृषा से,त्राण पा अवधूत हूँ !
कृष्ण ने चाहा  उसे -
जिसने मितायी उस को दी! कृष्ण ने त्यागा उसे -
जिसने विदाई उसको दी !
कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति-
 
जिसे राधा कहो !
कृष्ण की उन्मादिनी भक्ति-
 
जिसे राधा कहो !
कृष्ण,कर्षण कर सकी -
रमणीजिसे राधा कहो !
उस रमणी की चरण रज हूँ !
धूल हूँ !
मूक हूँ ,अभिभूत हूँ !
युग युगांतर की तृषा से त्राण पा अवधूत हूँ !
श्री दिनकर जोशीजी ने राधा -कृष्ण के दिव्य प्रेम मय सम्बन्ध पर एक पुस्तक लिखी है _"श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते उसे पढ़ने के बाद जो अनुभूति हुई,उसी की अभिव्यक्ति है यह रचना .
.
कृष्ण 



जिसके मात्र स्मरण से ही हर संताप बिसर जाता है वह तो केवल एक कृष्ण हैं !
जिसकी स्वप्न झलक पाते ही हर आकर्षण बिखर जाता है जो सबके दुःख का साथी है सबका पालकजनकसंहर्ता वह तो केवल एक कृष्ण हैं .
साक्षी सबके पाप पुण्य का ,न्यायमूर्ति सृष्टि का भरता ,वह अवतार प्रेम का मधु का ,अनघ,शोक मोह का हरता वह तो केवल एक कृष्ण हैं

5-4-09







 
 


 
शोक निवारक योग

योगेश्वर ने है दिया शोक निवारक योग ,
सृष्टि के है मूल में आधेयआधार .
प्रकृति के पीछे पुरुष,पुरुष -प्रकृति आधार ,
फल आधारित पुष्प पर,पल्लव पुष्प आधार .
पल्लव आश्रित शाख परतना शाख आधार,
मूल आधार स्कंध की बीज वृक्ष आधार .
बीज आधारित भूमि पर,भूमि परिक्रमा बाध्य ,
करती पथ पर ही गमन ,सूर्य देव आराध्य .
ढूध-धवलता  पृथक अग्नि से ताप ,
जल -रस,प्रकृति -गंधमयवायु सहित है भाप,
राधा -माधव एक हैं एक तत्व दो नाम ,
 शासक  शासिताप्रेम बहे निष्काम .
आत्मा शाश्वत तत्व है ,रूप व्यक्त आधार
 नारी - नर दो बिम्ब हैं दोनों सृजन आधार .

२०.०६.२०१०