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गुरुवार, 29 नवंबर 2012

आत्मनिष्ठ




आज फिर से शान्ति है छाई हुई मेरे जगत में .
छिप विहाग के पंख में अब उड़ चले आक्रोश के त्रण!
भावनाए सुप्त है उद्दाम लहरें मिट चुकी हैं धीर -सागर -नीर में .
प्राण हैं निशेष केवल ,मैं अनन्य भाव हूँ !
उज्ज्वला हूँ ,दीपिका हूँ गीतिका हूँ ,काव्य हूँ !
शान्ति का विस्तार है और प्रेममय साम्राज्य है !
शासिका निर्वेद हूँ ,
सत्ता हूँ मैं  मैं साम्राज्य हूँ !...

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