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गुरुवार, 29 नवंबर 2012

नारी


नारी हरी की है कला ........परम पुरुष की शक्ति
वह जननी है पुरुष की ..प्रकृति की अभिव्यक्ति .

वक्त ने जो भी दिया वह खा लिया
वक्त को मैंने मगर अब खा लिया.
खुदा  
जो खुद में आकर बसे वो ही खुदा कहाए
खुद को उसके रंग रंगों खुदा कहीं न जाए.

 



वंशी की धुन 
वंशी की धुन बाजती प्रकृति के अनुरूप
कहलाओ चाहे कोई नदिया ,धरती ,धूप.



नारी नर दो बिम्ब हैं दोनों सृजन आधार
इश्वर के ही अंश हैं यह ही सत्य विचार.




आहुति हूँ यग्य ..की.. हर सांस सामिग्री का कण
विभु में समाहित हो रही शनैः  शनैः ..क्षण.. क्षण !

अनूभूति अव्यक्त है अभिव्यक्ति है सेतु ,
ह्रदय से ह्रदय मिलें कविता है इस हेतु .




कुटिल व्यूहों,व्यंगबानों  के लगें जब डंक,
चेतना के विहग ने तब ही उगाये पंख . 
 23 April 2011



मैं क्यूँ बोलूँ ?कहाँ अब भ्रान्ति कोई?
निशब्द होता है अहसास ,जगे जब आत्मा सोई !
3 April 2011




छिप छिप कर मिलते हो , मिल कर छिप जाते हो 
एक झलक देखला कर ओझल होजाते हो ..
कब तक नाच नचाओगे ओ रास बिहारी ?
कुछ तो रहम करो उन पर जो शरण तुम्हारी!



 सम्बन्ध


मृत्युलोक में मृत्यु सुनिश्चित
व्यक्ति ,वस्तु हो या सम्बन्ध .
आते हैं  सब लौट लौट कर
पूरे करने ऋण -अनुबंध .






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