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गुरुवार, 8 अगस्त 2013

ह्रदय की घाटी

छू पायेंगे ह्रदय की घाटियों को ग्रीष्म के उजले फुएं से मेह.
हवाओं इन फुओं को ले उड़ाओ  झलकने दो शांत नभ का नेह .
बादलों का प्रेम निष्ठुर, बींध देता देह कभी रिमझिम, कभी गर्जन-क्रूर भर हुंकार आँधियों सा उमड़ता   तो कभी चक्रावात ,कभी ओलों सा बरसकर, बन गया एक भार .
घाटियों की भूमि नाम है मत करो अघात गुनगुनाती धूप से दो भूमि को श्रृंगार ,उलसने दो बीज फूलों के बनो वातास ,प्रेम में स्पर्श दैहिक खोजो साभार ,






मुक्त फूलों की महक है मुक्त रश्मि-विलास मुक्त है उर मुक्त है स्वर मुक्त मधुकण हास मुक्ति सबकी कामना है मुक्ति में हैं राम !
२७--09

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज शुक्रवार (09-08-2013) को मेरे लिए ईद का मतलब ग़ालिब का यह शेर होता है :चर्चा मंच 1332 ....में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आभार शास्त्रीजी लगता है आप ह्रदय की घाटी में बहुतों को पहुंचा देंगे ..पुनः आभार ह्रदय से

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  2. अनुभूति अव्यक्त है अभिव्यक्ति है सेतु

    ह्रदय से हृदय मिलें कविता हैं इस हेतु

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