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गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

निश्चल प्रेम

5 September 2013 at 15:01

जो चाहे मर्त्य वस्तु को
                      उसका प्रेम छल भर है
जो न मांगे कभी कुछ भी
उसी का प्रेम निश्चल है .Image may contain: one or more people and text

3 टिप्‍पणियां:

  1. कहने को तो प्रेम बहुत सरल है
    मगर दुनिया का सबसे कठिन विषय
    दुनिया भर के मनीषियों ने सहज रूप से शुरूआत
    करके इसे ईश्वर के चरणों तक पहुचा दिया
    मरे जैसा हलका फुलका कवि इस विषय को छूने का सामथ्र्य नहीं रखता
    फिर भी साहित्यकारो से सुना है
    त्याग तपस्या ही सच्चा प्रेम है
    सच्चे प्रेम की परिभाषा लिखने की बहुत बहुत बधाई

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  2. आत्मा का स्वाभाव ही बिना शर्त का प्रेम है ,सांसारिक सम्बन्ध प्रेम के शत्रु की तरह हैं क्योंकि वहां अपेक्षा है आशा है शर्त है पर शुद्ध प्रेम इनसे परे है व्यक्ति स्वयं नहीं जानता की यह प्रेम कब कैसे उसे आंदोलित कर देता है .... प्रकृति का प्रेम ही शुद्ध तम है जो शांत रह कर सबको जन्मती पोषित करती और अंत में मृत्यु के रूप में विश्राम देती रहती है

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