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बुधवार, 31 जुलाई 2013

पीछे रखना अवसादों को ..

उतने ही प्रिय हैं ये आंसू
जितनी प्रिय तुमको मैं लगती
हैं ये भी उतने ही खारे
जितनी निष्ठुर मैं हूँ लगती
आंसू को जैसे मैं चाहूँ
बस एकाकीपन की खातिर
जैसे उनको पी जाऊं मैं
सबकी नज़रो से छिप छिप के
ऐसे ही नाता जोड़ा है
तुमने इस अद्भुत प्राणी से
क्या शब्दों में कह डालूँ मैं
इन बिखरी -उलझी बातों को
मन खुद ही समझ नहीं पाता
इन अनजानी सौगातों को ,
आंसू बिन आँखें हंसती हैं
फिर भी सूनी ही लगती हैं
ऐसे ही तो खोये हैं हम
अपने जीवन के आँगन में
ऐसे ही बस ढलने देना
जीवन की सुबह शामों को
पेड़ों के काले झुरमुट के
पीछे रखना अवसादों को ..
1982

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