समर्थक

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

दिव्य पथ



मैं पथिक हूँ दिव्य पथ की
क्या मुझे ठग पाओगे तुम ?
मैं प्रिया हूँ उस महिम की ,
क्या मुझे छू पाओगे तुम ?
शान्ति अनंत अनंत ...
अविराम निर्झर निर्गमित है
प्रेम का ..विश्राम का ..
मैं उसी रस की हूँ रसिका ..
क्या मुझे दे पाओगे तुम ?
प्रेम है विश्राम है
आश्रय है ,न संताप है ..
तृप्ति ..संतृप्ति ..सदा दे
मैं उसी जल की हूँ तृषिता .
क्या तृषा हर पाओगे तुम ?
मैं पथिक हूँ दिव्य पथ की
क्या मुझे ठग पाओगे तुम ?
1982

1 टिप्पणी: