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गुरुवार, 25 जुलाई 2013

मैं और ख़ुदा


आज कितनी ही देर तक
सुबह से, मैं, मंदिर के द्वार पर
बैठी रही थी- कि मुझे खुदा नज़र आ जाए..
और जब पत्थर के  खुदा से मिल कर
लौट रही थी तो कुछ और ही
नज़र आया .
शायद, हादसा कहना बेहतर होगा -
कि जिंदा या कहूँ अधमरा, सड़ता ,बदबू से भरा
मेरा ख़ुदा फटे चीथड़ों में लिपटा, कटोरा थामे
सड़क के उस पार ,पड़ा सिसक रहा था
मैंने देखा और पहचाना भी, फिर भी उससे मिलने की
हिम्मत ही कहाँ थी मुझ में ?
उस की दुर्गन्ध से बचने के लिए
मैंने धूप महकायी,थाली में रखा चन्दन सूँघा
 औरचाहा  कि -यह जिंदा ख़ुदा किसी तरह
मुझ से दूर होले !
मैं यूं ही, बिना पीछे देखे ,आगे बढ़ आयी
कोशिश करती रही कि -पत्थर का ख़ुदा याद रहे
और जिंदा ख़ुदा मिट जाए मेरी आँखों से !
किन्तु, ऐसा नहीं हो सका
मैं ख़ुदा को मनाने के लिए नाम रटती रही ,
भजन गाती रही,मन्त्र जपती  रही, पर, फिर भी
 मेरा ख़ुदा मेरे सामने आ आकर
रोता रहा ,तड़पता रहा ,भिनकता रहा।
न पत्थर का ख़ुदा मुस्काया
न इंसानी ख़ुदा हंस पाया
न मुझे खुद को सुकून मिल पाया
शायद कि आज मैं और ख़ुदा
एक ही हालत में जी रहे हैं
एक ओर मंदिर के अहाते में, पत्थर पर अंकित हो
सजे धजे दिखते हैं ;दूसरी ओर
सड़क पर अपाहिज की तरह ,औंधे पड़े
सड़ते और तड़पते हैं !
1983

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