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गुरुवार, 25 जुलाई 2013

मैं


किसी ने फूल कहा तो
किसी ने पत्थर मुझ को
किसी ने दूर से देखा ,
किसी ने पास आ कर ,
किसी ने प्यार बरसाया
समझ कर प्रेम की सरिता
किसी ने शब्द -वर्षा की
समझ कर रूप -गुण राशि ,
किसी ने छीननी चाही
मेरे व्यक्तित्व की गरिमा
किसी ने की बहुत कोशिश
मुझे पंकिल बनाने की .
कोई बोला- कि निर्झर हो ,
कोई बोला- कि पतझर हो ,
किसी का स्वस्ति वाचन था ,
कोई बोला - निकम्मी हो !
सदा ही खोजती रहती अपनी
परिभाषा, नहीं पाया कभी अब तक
किसी को अपने ही जैसा .
कभी पाया की सब कुछ हूँ जो
लोगों ने कहा मुझ को
कभी समझा अकिंचन हूँ .
जो सच है मानती हूँ अब
मैं तो विचरती हूँ
है विपु तो मात्र एक वाहन
मैं आत्मा हूँ, अनश्वर हूँ
सदा उन्मुक्त फिरती हूँ
कभी फूलों में छिप बैठी
खिला यह मुग्ध तन वाहन
कभी चाहा हो परिवर्तन
हुआ पंकिल कभी वाहन
कभी मंदिर में खोयी हूँ
कभी निर्जन  में रोई हूँ
कभी भीगी हूँ वर्षा में
कभी तपती दोपहरी में
स्वयं पे मुग्ध रहती हूँ
सदा संतृप्त रहती हूँ !

1984

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