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गुरुवार, 25 जुलाई 2013

संकल्प


भावना का तेज झोंका,
बन के आये तुम
कभी अंधियारे ह्रदय में
तीव्र दामिनी से
 हो चमके तुम ,
प्रेरणा बन के कभी
मुझ में समाये हो
कभी विकृति बन ,
सताने भर को आये हो
दूर जाते हो कभी तुम
पास आये हो
भूल जाते हो कभी
तुम याद  आये हो ,
बन के बादल छाये हो
मेरे गगन में ,
तुम हो बरसे उमड़ कर
मेरे नयन से ,
धूल कण से आँख में
उलझे रहे तुम ,
फूल बन कर ,पर
नहीं महके कभी तुम
शलभ से मंडराए हो
मेरे ही परितः
पर सुहृद सा साथ
कब दे पाए हो तुम ?
लहरों की तरह मेरी \
तरणि को ठेला ,
बनके नाविक खेने
कब आये हो पर, तुम?
व्यर्थ है छलना तुम्हारा
तुम स्वयं अनजान हो ,
मैं नहीं वह जो
दुखो से हार जाए
या परिवर्तनों से
ऊब जाए ,डूब जाए
मुस्कुराना है
मुझे और जीते जाना
मुस्कुराना और
दुखों से जीत जाना !

1984

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