समर्थक

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

आत्म निर्णय


सुबह कितना रोई थी
जाने कितना सिसकी थी
और सिसकियों ने ही
जैसे ज़िंदगी बदलदी थी
दोपहर तक आते -आते
चहक उठी थी
हंसती और हंसती थी
खुद पे ,तुम पे ,हर एक पे .
शाम आ चली है अब
ऊबने लगी हूँ मैं
रोने और हंसने से;
खोने और पाने से ;
लेने और देने से ;
दौड़ती थी ,हांफी थी ;
अब टहलती रहती हूँ;
अपना हक़ जमाती थी;
चैन खुद गंवाती थी;
अब उधार रखती हूँ;
सोती थी ,बहकती थी;
जागती थी,रोती थी;
अब तटस्थ रहती हूँ .
अपने पास रहती हूँ ,
अपने  साथ रहती हूँ !
1983

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें