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बुधवार, 17 जुलाई 2013

बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद ,
जैसे देखा हो तारों भरा आकाश ..
बहुत दिनों बाद ,
फिर से उमड़ा हो 
खो चुके कल का अवसाद ..
बहुत ..बहुत.. बहुत.दिनों बाद ..!
कंचित झिल - मिल ज्योति स्मृतियाँ 
जैसे तारा  पुंज ..
मलिन ह्रदय का तामस गह्वर, 
फैला जैसे श्यामल व्योम ..
रात्रि शेष है !
चाँद नहीं है !
रात्रि  बहुत निष्ठुर है !
संसृति मय रात्रि ....
बहुत ...बहुत ..बहुत...दिनों बाद ...!
अमा को क्यों आना था ?
पूनम तो कहीं खो गयी 
अमा से ही अब अनुराग 
पूनम क्यों याद आ रही 
 बहुत ...बहुत दिनों बाद ...!
शांत ,तरल ,निर्मल सागर का 
चन्द्र रश्मियों से आलोकित नीर 
तनिक चंचल , हो अधिक अधीर ..
किन्तु क्यों आ जाता है ज्वार ?
बहुत ...बहुत...बहुत. दिनों बाद ...!
 अगस्त 1981

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