समर्थक

बुधवार, 17 जुलाई 2013

अहंकार

मेरा "मैं "
कहाँ रख दूँ इसे जाकर ?
कई बार ,
जा जा कर मैंने 
इसे अपने हाथों से 
दफनाया है!
कई बार मरघटों पे 
इसे जलाया है 
हर बार ,
हर बार ही मैंने 
मात खाई है !
"यह " हर बार मुझ को 
बहका  कर ,
शैतान सा लौट आया है !
मेरा "मैं ", तुम्हारा और उसका "मैं "
जाने कब से 
हमें नाचता रहा है 
अजीबो गरीब 
मुखौटे रख कर हम पे 
अलग -अलग ,
सतता और जलता रहा है !
कि 'तुम" हो यह ,
और 'मैं' हूँ एक ,
एक 'वह ' भी है 
फिर भी तुमको मालुम है 
की तीनों ,आज भी 
जहां भी हैं ,खाली हैं !
अपने -अपने पिंजरों में ,
"मैं " के शिकंजों में ,
अक्सर, फडफडा कर ,
छटपटा कर भी 
मुक्ति नहीं ढूँढ़ पाए हैं 
और आज तक खड़े हैं -
जकडे हुए ,आकडे हुए ,
इसी धोखे में कि 
शायद "मैं " ही हम हैं !
वह शैतान ,कभी मुझ पे 
कभी तुम पे , कभी उसे पे 
सवार हो कर हंसता है बाकी दोनों पर !
लेकिन अपने अपने पिंजरों में 
तीनों एक जैसे फंसे है।।
रोते  हैं ,सिसकते हैं पर 
दुसरे से मिलते ही 
मुस्कुरा पड़ते हैं !
1983

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें