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मंगलवार, 16 जुलाई 2013

भाग्य



अभी अभी एक ही पल में 
सिर्फ इस पल के लिए ,
'मुझे भाग्यवादी बनना पड़ा है 
कल तक, मेरे दरवाजे पे 
खड़ा था भाग्य,पर मैंने
 द्वार नहीं खोला था
पर आज मुझे फेंक बाहर 
वह अन्दर आ गया है 
मैं दस्तक दे रही हूँ खड़ी खड़ी 
एहसास होता है अपनी भूल का 
कि कैसे घुस गया भाग्य
 मेरे बुलंद दरवाजे में 
शायद जो खिड़की छोड़ दी थी
 मैंने खुली हवा के लिए 
वही आज एकछत्र शासन
 कर रही है मुझ पर 
और मुझे मेरीठण्डी  देह से टकराती
हवा का पाला मार गया है !
1979
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